Saturday, October 31, 2009

कांग्रेस की सफलता और बीजेपी खस्ताहाल

राहुल गाँधी ने जबरदस्त चुनावी प्रबंधन किया, कांग्रेस को खेमेबाजी से बचाते हुए राज्यों को विकास के सपनो से जोड़ा। हालत उनके लिए भी कम मेहनत व जद्दोजहद वाला नही था। भारतीय जनता पार्टी ने मौका गवा दिया। उनकी आपसी फूट व कलह ने तीन राज्यों के चुनाव में पहले ही कांग्रेस को वाक ओवर दे दिया । पार्टी विथ डिफ़रेंस की छवि धूमिल होती जा रही है। कांग्रेस के वंशवाद, परिवारवाद, सत्तालोलुपता के विरूद्व धारदार अभियान चलाने में नाकाम रहे भाजपा नेतृत्व को अपनी अपनी कुर्सी की ही पड़ी थी। संघ नेतृत्व के प्रति आस्था जताने वालो ,उनसे सर्जरी की मांग करने वालो, जसवंत प्रकरण पर अपनी बेचैनी प्रदर्शित करने वालो की कोई कमी पार्टी में नही रही। बिना मजबूत विपछ के सत्ता व शासन में रहने वाली सरकार का नजरिया जनता के प्रति कैसी हो सकती है, इसकी उम्मीद पाठक कर सकते है। कांग्रेस ने बड़ी सोच समझ कर खासकर मुबई में राज ठाकरे को पुष्पित पल्वित होने दिया। शिव सेना के बड़बोले पण की हवा निकाल दी। आरुनाचल में कांग्रेस की सफलता लगभग तय थी। उतर पूर्वी राज्यों की और देश की शेष दछिन पंथी पार्टियों के बीच अब भी दुरी बनी हुई है। यह खतरनाक स्थिति है। वाम पंथी नक्सली संगठनो द्वारा नेपाल से बिहार, उडीसा होते हुए आन्ध्र प्रदेश तक बनाया गया रेड कारीडोर भारतीय एकता व अखंडता के लिए गंभीर चुनौती है। राजनीतिक दल खास कर राष्ट्रीय पार्टिया आपसी खीचतान में न उलझ कर राष्ट्रीय समस्याओ के प्रति गंभीर हो तो कोई बात बने। जिस देश में लाखो गरीबो के घर बच्चो को अब भी भर पेट भोजन नही मिल पा रहा हो वंहा आपसी फुट व अंतर्कलह से आख़िर हम किसे मुर्ख बनाते है। कलयुग में दरिद्रनारायण के घर ही नारायण का अवतार होने वाला है। जो सही मायनो में हमारा पथ प्रदर्शक, दुखो को हरने वाला होगा। हमारी गति मति यह है की हम इन्हे ह्रदय से लगाते चले। याद रखे की इस देश में कितने बादशाओ , शहंशाओ को इतिहास ने अपने पैरो तले कुचल दिया है। आपकी सारी नफरते, क्रोध, बेईमानी धरी की धरी रह जाएँगी। अपने साथ समाज व समुदाय का भला नही सोचने वालो का जीवन व्यर्थ ही है।

Wednesday, September 23, 2009

हिन्दी पट्टी की संवेदनाओ को कब मिलेगी जुबान

हिन्दी दिवस बीत गया, कई लोगो ने इस दिवस के नाम पर अपने अपने तरीके से कर्मकांड को पुरा किया। भाषा की पीडा को समझाने व् समझाने में अपनी उर्जा झोक दी। हिन्दी पट्टी की समस्याओ और भाषा के संकट के मध्य संबंधो को जोड़ने में असफल रहे। आखिरकार कब हिन्दी स्थानीय समस्याओ और पीडा को दूर करने का सशक्त माध्यम बनेगी। नवजागरण काल का तेवर हिन्दी में कब लौटेगा। माना की उस वक्त आजादी सम्पूर्ण राष्ट्रीय आन्दोलन का लक्छ था हिन्दी उसकी वाहिका थी, लेकिन आज जब दूसरी आजादी की जरुरत महसूस की जा रही है, क्या हिन्दी को अपनी भूमिका नही बदलनी चाहिए। हिन्दी अखबारों ने अपनी भूमिका बदल ली है लेकिन दुसरे संदर्भो में, वह विशुद्ध तौर पर वयवसाय से जा मिली है। वहा कारपोरेट कल्चर हावी होता जा रहा है। उसे आम आदमी की पीडा सोने के बढ़ते घटते भावः से कमतर महसूस होता है। महानगरीय कल्चर उसे अपनी ओर खीच रहा है। उसे हर आदमी मशीन में तब्दील होता दिख रहा है। हिन्दी के साथ नये प्रयोग किए जा रहे है जहा हिंगलिश में उसका नया रूप देखने को मिल रहा है। हिन्दी पहले भी देश की आत्मा थी, कल भी रहेगी, कोई इस मुगालते में न रहे की पल पल मरती अन्य भाषाओ की भाति इसकी मौत होने जा रही है। लेखको को जनसरोकारों वाले मुद्दों को साहित्य का अधर बनाना होगा, रोमांटिक खयालो में आम आदमी की पीडा को नजरंदाज नही किया जा सकता। मंचीय कविताओ को भौदेपन से मुक्त कर धार देनी होगी। भाषा के साथ जीना होगा , उसमे संवेदनाओ की प्रबल हिस्से को महसूस करना होगा। आईये, इस ओ़र हम अपने कदम को आगे बढाये, उस पुण्य के भागी बने जिसे हमारे पूर्वजो ने अपने खून और पसीने से सीचा है। थोड़ा सा प्रलोभन या पुरस्कार हमें अपने मार्ग से नही डिगा सके।

Thursday, August 27, 2009

भाजपा आज नही जनसंघ के ज़माने से ही भटक चुकी है

आप कभी नवजागरण कालीन हिन्दी पत्रकारिता पर नजर डाले। पुरानी फाइलों को खंगाले। आप देखेंगे की भाजपा आज नही जनसंघ के ज़माने से ही भटकी हुई है। मेरी समझ जित्तनी है, उसके मुताबिक अटलजी भारतीय सनातन राजनीतिक परम्परा के अन्तिम राजनेता है। सबको साथ लेकर चलने की समझ न तो जनसंघ ही विकसित कर सका न ही भाजपा उस परम्परा का निर्वाह कर सकी है। भारतीय राजनीति की दिशा व् दशा तब से ही बदलनी शुरू हो चुकी थी जब कांग्रेस में गर्म व् नरम दल के बीच मत्भिनता चरम पर थी। १९३० के पूर्व गांधीजी के कई प्रयोग असफल सिद्ध हो चुके थे। गाँधी भारतीय समाज की धड़कन को समझाने का प्रयास कर रहे थे। जिन्ना को लेकर पब्लिशिटी बटोरने के इक्छुक राजनेताओ को जनसंघ के पूर्व की हिंदूवादी सहिष्णु विचारधाराओ का भी विश्लेषण करना चाहिए। उसमे आए भटकाव की भी चर्चा करनी चाहिए। उन्हें बताना चाहिए की कैसे ब्रिटिश सरकार ने रास्ट्रवादी पत्रकारों व् लेखको को मौत के घाट पहुचा दिया। कई लोग जेलों की सजा काटे। क्यो गणेश शंकर विद्यार्थी को बीच सड़क पर दंगा फसाद करने वालो ने कानपूर में मार गिराया। जिन्ना को उर्वर भूमि प्रदान करने वालो में क्या बड़े राजनेताओ के साथ भारतीय मानसिकता में आ रहे परिवर्तन की भूमिका नही थी। इस देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है की हम हरे चश्मे से लाल देखना चाहते है। अपनी गौरव गाथा को भुलाना कोई हम से सीखे। आज कितने घर है जहा बच्चो कों भारतीय वीरो की गाथा, भगत सिंह,असफाक , बिस्मिल की कहानिया सुनाये जाते है, शिवाजी, राणा प्रताप, सावित्री, लक्छमी बाई, सरवन कुमार की जानकारिया दी जाती है। बाजार की भाषा में बात करे तो अच्छे प्रोडक्ट के लिए थोडी तयारी तो करनी ही होगी।

Tuesday, August 11, 2009

पीठ पीछे वार कर रहा बाजार हमारी जेब पर

महंगाई को लेकर पुरे देश में हाय तौबा मची है। सुखा व् बाढ़ की विभीषिका से जूझ रहे लोगो के ऊपर महंगाई की मार तेज है। स्वैईन फ्लू ने अपने पाव जमने शुरू कर दिए है। मिडिया सब कुछ को हलके में ले रही है सिर्फ स्वैईन फ्लू को छोड़ कर। अपनी प्रथामिकताये तय करने मिडिया का कोई जबाब नही है। तथ्यों के पीछे न जा कर हलके में कोई बात कैसे की जाती है यह इसे वर्तमान समय में सिखा जा सकता है। जब अमेरिका, जापान सहित एनी देशो में लाखो लोग स्वैईन फ्लू से पीड़ित है और मरने वालो की संख्या कही ८५ तो कही ३०० के आसपास है। फिर भारत में इसको लेकर हाय तौबा मचाना कहा की फितरत है। शहरो में मरने वाले लोग मिडिया कोई दिख जाते है, लेकिन दूर गाव में जो भूख से मर रहे है, उन्हें प्रशासन भी रोग से मौत बता देता है। चीनी की कीमत ३२ रूपये हो गई है तो दाल आम आदमी केथाली से गायब होता जा रहा है। इथनौल के उत्पादन को लेकर पहले तो चीनी के उत्पादन पर झटका लगा, फिर बिक्री कैसे हो। हद तो यह है की बिहार जैसे सर्वाधिक गन्ना उत्पादक राज्य में भी दुसरे राज्यों की तरह धन अर्जित करने को लेकर सरकार के स्तर से ही गन्ना से सीधे इथनौल बनने की अनुमति देने की मांग की जा रही है। कई बड़ी कंपनियों ने तो हजारो करोड़ के प्रस्ताव भी दे रखा है । राज्य सरकार भी केन्द्र की ओर उम्मीद लगाये बैठी है । विकास की नीति बनाने वालो को धरती पर रह कर सोचना होगा। चीनी के बाद गुड की सोचे तो, सरकारी नीतियों की पोल ही खुल जाती है। गाव चौबारे में गुड आज की तारीख में दुर्लभ चीज हो गई है। गुड उत्पादन पर इतने तरह के प्रतिबन्ध लगा दिए गए है की कोई किसान सोचता तक नही, अगर उत्पादन करता भी है तो सिर्फ अपने उपयोग भर ही। कई खाद्य पदार्थ तो खेत खलिहानों से गायब होती जा रही है। कोई इस पर शोध करे तो कई रोचक जानकारिया प्राप्त हो सकती है। आप कविताये लिख कर या कंप्युटर चलाकर ही अपने पेट नही भर सकते, हमें अपने अन्दताओ की ख़बर रखनी ही होगी।

Saturday, July 25, 2009

लूटती रही अस्मत, न्यूज़ रूम में शुरू हुआ विश्लेषण

पटना के भीड़ भरी सड़क पर गुरुवार को एक महिला की अस्मत लुटती रही। उसके कपड़े तार तार किए जाते रहे,
जैसे ही अखबार के दफ्तर में ख़बर पहुची सन्नाटा पसर गया। सब ख़बर के हर पहलु को जानने को बेताब हो उठे। फिर शुरू हुआ विश्लेषण का सिलसिला। कोई महिला को बाजारू बता रहा था तो कोई पुलिस प्रशासन की गर्दन नाप रहा था। कोई इस बात को समझने को तैयार नही था की एक औरत की सरेआम हो रही बेइज्जती, हम सबो के गाल पर एक करार तमाचा है। मानसिक रूप से विकलांग हो चुके युवक या एक स्त्री के बाजार तक पहुचने के पीछे हम सबो की कोई सामाजिक जिमेमेवारी है भी या नही । हद तो यह है की एक दो सज्जन तो तीसरे दिन यानि आज सरकार द्वारा भारी सामाजिक दबाब में आने के बाद आईजी से लेकर छोटे पदाधिकारियों का तबादला कर दिए जाने को भी एक ग़लत महिला के चच्कर में की गई कार्रवाई बताते रहे। प्रेम के नाम पर, पैसे के नाम पर महिलाओ का मानसिक शारीरिक शोषण करने वाले लोगो की कमी नही है। उन्हें दुनिया के हर संबंधो में सिर्फ व सिर्फ सेक्स की बू आती है। कोई मजबूर महिला मिली नही की उसका शोषण किया जाने लगता है। हद तो यह है की इसके बीच पड़ने वालो को ही बाद में अपने जान की बन आती है। व्यक्तिगत तौर पर लोगो ने किसी सामाजिक बुराई को रोकने के लिए हस्तछेप करना बंद कर दिया है। लेकिन बीच सड़क पर किसी के साथ अनहोनी होती रहे और लोग तमाशबीन बने रहे यह पचने वाली बात नही है । यह सामाजिक नपुंसकता को दर्शाता है। माना की कोई महिला ग़लत हो सकती है, लेकिन उसके साथ भी शारीरिक बल का प्रयोग करना, बीच रास्ते पर नंगा करने की कोशिश करना इसे किसी भी सूरत से उचित नही ठराया जा सकता है । शर्मनाक घटनाओ की भर्त्सना की जानी चाहिए न की उसे किसी की गलती का नाम देकर उससे पीछा छुडाना या हलके में लेना चाहिए ।

Friday, July 24, 2009

सच का सामना कितना सच

इनदिनों बिंदास बोली, रहन सहन , फिल्म, प्रदर्शन , मिडिया के नाम पर अर्ध सत्य को सत्य बनाने की हर सम्भव कोशिश की जा रही है । एक निजी चैनल पर संचालित किए जा रहे सच का सामना शीर्षक कार्यक्रम में जी प्रकार के साक्छात्कार दिखाए जा रहे है उसे बदलती मानसिकता के नम पर परोसा जन किसी भी दृष्टी से उचित नही है। बाजार आपके घर को नंगा व् बेपर्द करता जा रहा है इसकी समझ भी रखनी होगी। सच के नम पर पोल्योग्रफिक मशीन के सहारे उलुलजुलुल प्रश्नों को रखना, उसे प्रसारित करना ग़लत है प्रवृति को बढ़ावा देना होगा। आप आखिर क्या चाहते है, सभ्य समाज की रूप रेखा आपके दिमाग में क्या है , इसे तो पहले स्पस्ट करना होगा। क्या मर्यादाओ का उलाघन ही हमारी आजादी की परिचायक है। अपने अर्ध्य सत्य को हम कबतक मशीनों के शेयर सत्य साबित करते रहेगे ।

Monday, July 20, 2009

खाद्य आपूर्ति की प्रणाली ध्वस्त

राष्ट्रीय स्तर पर खाद्य वितरण की जनवितरण प्रणाली ध्वस्त हो चुकी है। गरीबो और निम्न मध्यम स्तर के लोगो के जीवन के लिए यह महत्वपूर्ण योजना है। जिस देश में ७० फीसदी आबादी प्रतिदिन १६ रूपये पर गुजरा करता हो, महंगाई चरम पर हो , वहा इस प्रमुख योजना का बेमौत मरना शोक का विषय है। हल ही में सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व न्यायाधीश दी पि बढावा की अध्छ्ता में एक कमिटी का गठन कर इसकी जाच कर अपनी अनुशंसा करने को कहा है। बधवा कमेटी ने पॉँच राज्यों का दौरा क्र के अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सौप दी है। शेष राज्यों का दौरा कमेटी कर रही है। आयोग का स्पस्ट मानना है की पुरी प्रणाली को दुरुस्त करने की जरूत है। बीपीएल, अन्त्योदय के नम पर गरीबो को सस्ता अनग सुलभ करना सपना हो गया है। मध्यम वर्गीय परिवारों की आधी से अधिक कमाई दो जून की रोटी के जुगाड़ में ही चुक जा रही है। अनाज के गोदाम भरे है , विदेशो से अनाज मंगाया जा रहा है, लोगो को राशन की लम्बी लाइनों में राशन किराशन नही मिल पा रही है । धोदा इधर भी देखिये।

Friday, July 3, 2009

समलैगिकता को लेकर हो रहे सब गुमराह

समलैगिकता को लेकर इन दिनों गली कूचो, कोर्ट व धार्मिक संगठनो, नेताओ के मध्य हरतरफ चर्चा हो रही है। मनोवैज्ञानिको की थ्योरिया बताई जा रही है। हर कोई अपने अपने तरीके से इसकी व्याख्या कर रहा है। कई बार हमें लगता ही नही की हम आखिर कौन सी विरासत आने वाले समय के लिए छोरे जा रहे है। जिस देश में आधी से अधिक आबादी गरीबी रेखा से निचे गुजरबसर अपना जीवन करती हो, वहा न्यायालयों, संसद, और विद्वद समाज की उर्जा समलैगिकता को अनुमति देने या न देने के निर्णय के बीच व्यय हो रही है। यौन संबंधो की उच्सृखालता न केवल सार्वजानिक तौर पर देखि जा रही है बल्कि इसने अब अनिवार्य रूप से मांगो का, धरना, प्रद्र्सनो को अपना हथियार बना लिया है। प्रकृति के नियमो का उल्लंघन करने की सजा भुगतने के लिए तैयार रहे। आपके विचारो का वहा कोई देखने वाला नही होगा। भारतीये समाज का यह विभत्स्य रूप सायद ही कभी देखने को मिला हो । धारा ३७७ को लागु करने वाला लार्ड मैकाले माना भारतीय ज्ञान व् व्यवहारों का विरोधी था लेकिन उसे इतनी समझ जरूर थी, की इस समाज के लिए क्या उचित है और क्या अनुचित। जानवर भी अपने सामान जीव के साथ सामान्तया यौन व्यवहार नही करते। असामान्य तौर पर तो कोई भी कुछ भी करने को स्वतंत्र है। १८६० इसवी से अबतक आईपीसी की धारा ३७७ लागु है, अंग्रेजो से ज्यादा खुलापन शायद देखने को मिलता है, क्या फिर से हम किसी गफलत के शिकार होने नही जा रहे है.

Tuesday, June 9, 2009

बात दुःख या खुश होने की नही

बेवजह टिपण्णी किए जाने को लेकर साथियों के विचारो का स्वागत है। बात दुःख या खुश होने की नही है । सर्वप्रथम मै स्पस्ट कर दू की लिखने के बाद मै किसी से अपने विचारो की सहमती या असहमति की उम्मीद नही रखता । न ही किसी के टिपण्णी को लेकर मुझे शिकायत है । अति उत्साह में आप या हम अपनी समझ को ही प्रर्दशित कर देते है । ब्लॉग लेखन मेरे लिए रोग या नशा नही है। कोई मेरे ब्लॉग पर आए या नही इसकी भी उम्मीद नही रखता। हा, अच्छे विचारो का स्वागत है । कई लोग बेहतर लिख रहे है, उन्हें किसी के हिट्स की चिंता नही है। हमें उनसे प्रेरणा मिलती है।

Monday, June 8, 2009

टिपण्णी करने में संयमता का अभाव

बहुत दुखद बात हैं लेखन की स्वतंत्रता ने ब्लोगरो को उच्च्श्रीन्ख्ल बना दिया हैं । खास कर विषय की गंभीरता को समझे बिना ही टिपण्णी तक कर दी जाती हैं । ऐसे लोगो को अपने आसपास नजर दौड़नी चाहिए । टिपण्णी सकारात्मक हो विषय को स्पस्ट करने में सहायक हो तो बात समझ में आती हैं ।

Saturday, June 6, 2009

गरीबो की सुनो वो तुम्हरी सुनेगा

सर्व प्रथम बहुत दिनों बाद ब्लॉग पर आने के लिए माफी चाहता हु। मारकेश के प्रभाव से गुजरने का ताजा अनुभव हुआ है। लोकसभा चुनाव की भागमभाग अलग रही। कई विचारो के बीच से गुजरता रहा। काफी कुछ जीवन में अनुभव हुआ। फिलवक्त सरकारी तंत्रों के क्रिया कलाप की चर्चा करूँगा। अकसर ही हमारे द्वारा चुनी गई सरकारे अजीबो गरीब प्रथामिक्ताये तय करती है । शहरों के लिए बिजली पानी आवास की जुगाड़ सरकार करे हम अपने अपने कामो में दौलत अर्जित करने में लगे रहे । देहातो में अवश्यक सुविधाओ के लिए लोग तरस जाए । गावो के विकास की बात होती है तो कहा जाता है की वहा सुविधाओ के विकाश के लिए स्वयं सहायता समूहों का गठन किया जा रहा है। गाव के लोग स्वयं ही अपनी सुविधाओ की देख रेख करेंगे। शहरो के लिए कर्मचारियों की फौज हो और गाव के लोग अपनी देखभाल ख़ुद करे। यह कैसा विकास है।

Saturday, April 25, 2009

कैसे करे नेताओ पर भरोशा

१५ वी लोकसभा के गठन के लिए चुनाव अभियान तेज हैं । नेताओ के बीच गलाकाट प्रतिस्पर्धा जारी हैं । इनके बयानों के निहितार्थ निकलना मुश्किल हैं। जनता की मुलभुत समस्याओ से अलग बोलने में ये माहिर हैं। इनके चाल व् चरित्र को जागरूक मतदाता समझ रहे हैं। कई नामचीन नेता लाखो करोडो रूपये मतदाताओ के बीच वाट रहे हैं। कोई देखने वाला नही हैं। नोटों पर बिकने वाली जनता को इनके द्वारा किए जाने वाले लूट पर बोलने का क्या अधिकार हैं । जनता को प्रतिकार की भाषा सिखानी होगी। उन्हें मतदान के दौरान मतदान अधिकारी से किसी भी पसंदीदा उमीदवार के न होने पर अपना अभिमत दर्ज करना चाहिए आख़िर नेताओ पर जनता कैसे भरोसा करेराजनितिक दलों ने गठबंधन तैयार करे लिया हैं सत्ता में हिस्सेदारी के लिए । दुर्भाग्य यह हैं की किसी भी गठबंधन की और से कोई संयुक्त घोसना पत्र जारी नही किया गया हैं । कौन चुनाव बाद किस करवट बैठेगा कहना मुश्किल हैं । भारतीय लोकतंत्र के तारीफ करने वाले ग्रामीण क्षेत्रो में जाकर मतदान के पूर्व की हालातो का जायजा लेना चाहिए । २३ को मुजफ्फरपुर लोकसभा क्षेत्र में था । जार्ज को कैसे राजनितिक रूपसे भुला दिया गया

Wednesday, April 8, 2009

नोट, जूता और भारतीय राजनीति

सर्दियों का मौसम समाप्त हो चूका है, गर्मी का प्रकोप बढाने लगा है. चुनाव के इस मौसम में क्या नेता क्या पत्रकार सभी की त्योरिया चढी हुई है. अभिनेता परदे पर चरित्र बदलते थे, अब तो लगे हाथ उन्हें भी पाला बदलने का मौका मिल गया है .कई दिनों से चुनाव कवरेज़ में लगे होने के कारन ब्लॉग के लिए अलग से लिखना मुस्किल हो रहा था. खैर, नेताओ के नोट बदलते हाथो के बीच एक पत्रकार के हाथो में जूता देख कर मन ग्लानि से भर गया. इसी तरह से देश का हर नागरिक अपनी मर्याद की सीमाए लांघता फिरेगा तो काहे का लोकतंत्र व काहे का चुनाव. हथियार उठाने वाले हाथो को जूता उठाने वाले हाथ भला कैसे रोक सकते है. राष्ट्रिय राजनीति तथा पत्रकारिता की नीव हमारे पुरखो ने इसी लिए रखी थी. अब तो सोचने का वक्त आ गया है की, २५ करोड़ की आबादी के लिए अपनाया गया लोकतंत्र क्या एक अरब से अधिक भारतीयों के लिए मुनासिब नहीं रह गया है. पश्चिम से क्या जूता संस्कृति तक आयात करने की मानसिकता वाले हम हो गए है.सत्य का सामना करने का साहस हमारे अन्दर नहीं रह गया है. देश का सौभाग्य है की १५ वी लोकसभा के लिए सबसे अधिक मतदाता युवा वर्ग से है. क्या एक बार अपनी मातृभूमि के लिए अपने आने वाले सुनहरे कल के लिए जाति,संप्रदाय, छुद्र राजनीति से ऊपर उठाकर देश के नव उत्थान के लिए संकल्पित हो कर स्वच्छ छवि के उम्मीदवार को संसद के अंदर भेजने का प्रयास नहीं कर सकते. नोट बाटने वाले हाथो से धन लेकर फिर उन्हें सार्वजानिक धन लुटने का अवसर प्रदान करना कितना खतरनाक है इसकी कल्पना करना मुश्किल है. भ्रष्टाचार को सार्वजनिक व सामूहिक रूप प्रदान करना राष्ट्रद्रोह है. भूख,गरीबी व लाचारी को पैसे से कीमत अदा कर के अपने निजी उपयोग में लाना, ओछी मानसिकता है. चुनाव आचार संहिता का बार बार उलंघन किया जाना संगेये अपराध घोषित किया जाना चाहिए. किसी जर्नलिस्ट को भी किसी व्यक्ति विशेष के साथ आभ्द्रतापूर्वक पेश आने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है. महात्मा गाँधी, राजेंद्र प्रसाद सहित कई शहीद पत्रकारों ने अपने खून पसीने से पत्रकारिता को सीचा है.

Thursday, March 12, 2009

लोकसभा चुनाव में कैसे नेताओ का हो चयन

होली की खुमारी ख़त्म होने के बाद अब सभी का ध्यान आगामी लोकसभा चुनाव पर होगा । कई सियासी पार्टिया पूर्व से ही जोड़ तोड़ में जुट गयी हैं । भारतीय लोकतंत्र के इस महापर्व में सबो की भागीदारी हो, सचरित्र राजनेता संसद में पहुचे , इसकी भी जिम्मेवारी हम सभी को लेनी होगी ।
एक हास्य कवि महोदय ने फरमाया की जब मतदाता सूचि में गडबडी के कारण फुआ मौसा जी के साथ होगी, पत्नी की जगह पडोसन और बहन के स्थान पर बीबी का नाम होगा तो मतपेटी से सचरित्र नेता भला कैसे जन्म लेगा बात भी सही हैं । हमारे लिए सभी काम निहायत जरुरी हो जाते हैं जबतक वे निजी प्रतीत होते हैं लेकिन जब देश की बात आती हैं तो तरह तरह की परेशानी व पीडा होने लगती हैं । मुख्य चुनाव आयुक्त ने पिछले दिनों पटना में कहा की मतदाताओ में मतदान के प्रति रूचि जागृत करने के लिए अभिनेताओ का सहयोग लिया जायेगा । मुझे इस पर कोई आपति नहीं हैं लेकिन जरा सोचिये की कितनी भयावह परिस्थिति हैं । कम पढ़े लिखे, मजबूर,गरीब मतदाताओ को उपकृत करके उन्हें अपने पछ में वोट देने को मजबूर किया जाता हैं, लेकिन जो सछम हैं , वे अगर अपनी जिम्मेवारियों के प्रति लापरवाह हैं तो उसका दोष किसे दिया जाये । देश की मौजूदा परिस्थिति को देखते हुए हम सब का दायित्व हैं की नेताओ के चयन में सतर्कता बरती जाये ।

Tuesday, February 24, 2009

स्‍लमडॉग मिलेनियर को आस्‍कर भारतीय सिनेमा के लिए चुनौती

मैं यह नही कहता कि दूसरों के द्वारा की जाने वाली तारीफ बुरी होती है। किसी भी कार्य का मूल्‍यांकन स्‍वयं तब समझ में आता है, जब दूसरे उसकी तारीफ करते है। लेकिन जब आपके कार्यो को दूसरे अर्थो में तारीफ के काबिल बना दिया जाए तो थोडी देर के लिए ठहरकर सोचना पडता है। प्रसन्‍नता के साथ हमें आत्‍म विश्‍लेषण करना होगा। यह पुरस्‍कार भारतीय सिनेमा के लिए एक चेतावनी की माफिक है। भारतीय सिनेमा के लिए जो अस्‍प़श्‍य चीज है गरीबी उसने दो करोड की राशि जी‍ती है। मैं यह नही कहता की भारतीय सिनेमा गरीबी को प्रदर्शित करने में नाकाम रही है। लेकिन यार्थाथ से कटती जा रही हिंदी सिनेमा को देखना होगा कि आखिर भारतीय दर्शकों को हम क्‍या देखने को मजबूर किये जा रहे है। ग्‍लोबलाइजेशन का मंत्र ही यही है कि जो सबसे अधिक जानकारी अपने अनुभवों से रखेगा वही सफल होगा। स्‍लमडॉग के प्रदर्शन से भद्र लोगों को शक है कि उसने चीटिंग की है। भारतीय फिल्‍मों पर आप गौर करे तो पायेंगे कि यह स्‍टॉर आधारित है। यहां के स्‍टार बडे बडे लोकेशनों पर विदेशों में शुटिंग करना बेहतर समझते है। गजनी का हीरो अपनी प्रेमिका की हत्‍या का बदला लेने के लिए तत्‍पर रहता है। वह अपनी प्रेमिका को मुगालते में रखना चाहता है इसलिए टेम्‍पों पर चढता है, अविश्‍वनीय तरीके से खलनायक के डेन में बिना हथियार के प्रवेश कर जाता है। रब ने बना दी जोडी में भी नायक स्‍टार है। आप सोचे कि बिजली विभाग का कर्मचारी क्‍या किसी सूमों पहलवान से लडकर पत्‍नी के प्रेम को पाने की जुरूत कर सकता है। बिल्‍लू बार्बर भी नायक बनता है तो इसीलिए कि सुपरस्‍टार उसका दोस्‍त है. भारतीय सिनेमा अंडरवर्ल्‍ड, भूत, महानगरीय जीवन, सेक्‍स, विवाहेत्‍तर संबंध जैसे विषयों पर सिमट कर रही गयी है. इनका उदेश्‍य एक साथ दो हजार स्‍क्रीन पर मल्‍टीप्‍लेक्‍सों पर प्रदर्शित किया जाना मात्र रह गया है. गरीबी के प्रदर्शन के अपने मायने है. हमें अपने फिल्‍मों को उन परिस्थितियों से संबंद्व करना होगा जहां जाकर आम आदमी उससे अपना जुडाव महसूस कर सके. सच्‍चा पुरस्‍कार आम आदमी के समर्थन से मिलता है. किसी आस्‍कर द्वारा समर्थन दिये जाने के बाद उसको अंगीकार करना और उसपर झूमना मुर्खता हो सकती है. हमें अपनी प्रतिभा पर भरोसा रखना होगा. निसंदेह एआर रहमान, गुलजार प्रतिभावान है. बालीवुड में अगर वे अपनी ओर से कुछ ऐसा जोड सके जिससे उसकी मुख्‍य धारा में परिवर्तन हो, वह आम आदमी से जुड सके तो यह प्रशंसनीय होगा. दूसरों की तारीफ के बाद अपनी पीठ ठोकना उचित नही है. पिंकी के लिए यह पल यादगार बन गया। उसने विदेशी चकाचौंध को अपनी आंखों से देखा। इसके पूर्व भी हमें कई आस्‍कर मिले है, लेकिन इस बार भी जो सम्‍मान मिला उससे कही कोई लगाव महसूस कर पाना मुश्किल है।

Saturday, February 21, 2009

मौत का लाइव टेलीकास्ट सभ्य समाज के मुह पर एक तमाचा

अभी अभी यह जानकारी मिली की जेड़ गुडी जो की एक रियलिटी शो में शिल्पा शेट्टी को लेकर कभी नस्लीय टिपण्णी कर बैठी थी, उनकी संभावित मौत को लाइव टेलीकास्ट करने की तयारी की जा रही है। जेड़ गुड्डी कैंसर से पीड़ित है । उनकी मौत को टीवी पर सीधा प्रसारित करने के अधिकार किसी चैनल ने प्राप्त कर लिया है। प्राप्त जानकारी के अनुसार जेड़ गुड्डी ने भी अपने दो छोटे छोटे बच्चो की परवरिश की खातिर धन की जरूरत का हवाला देते हुए एक अच्छी खासी रकम प्राप्त करने के लिए अपनी मौत का लाइव टेलेकास्ट कराने को तैयार हो गई है । मानव समाज इतना निष्ठुर हो चुका है की किसी की जान जाए तो जाए उसे तो अपनी मस्ती व मनोरंजन की ही पडी है। हद तो यह है की पथ भ्रष्ट हो चुकी मिडिया भी अपने दायरे को भूल मौत को तमाशा बनाने में लगी है। यह सामाजिक पतन की पराकाष्ठा है । एक सज्जन ने फरमाया की भारत में तो मृत्यु के बाद वर्षो तक पंडित, ठाकुर, व गाव समाज के लोग जश्न मनाते है। मरने वाले के नाम पर पुरिया तोडी जाती है । कई लोगो की आजीविका चलती है । पंडे पिंड दान के नाम पर मजे करते है । एसे में जेड़ गुड्डी का अपने बच्चो की खातिर मौत के लाइव टेलीकास्ट का अधिकार बेचना सही है। क्या इंग्लैंड की जनता इतनी निक्कमी है की वह दो बच्चो का भरण पोषण नही कर सकती। उस समाज की संवेदनाये इतनी मर चुकी है की अब उनमे धन के लिए मौत के खौफ का भी असर जाता रहा । क्या भारतीय कर्म कांड व सनातन संस्कृति में किसी की मृत्यु को इसप्रकार से हास्यास्पद बनाया गया है । यह तो वह भूमि है जहा स्वमेव समाधि ले ली जाती है। किसी महिला के देह का दर्शन करते हुए उसके जीवन भर उसे सो बिजनेस का साधन बना देना, फिर उसकी मौत का तमाशा बना देना पश्चिम की देन हो हो सकती है , हमारी अपनी भूमि में यह निंदा का karan ही हो सकती है। अब कल को कोई कह दे की bachche का जन्म लाइव होगा, कितनी ghatiya bate होगी। अपने को सभ्य कहने वाली prajati और वह समाज, wha की मिडिया इतनी nikrist हरकत karegi यह aaklpaniya है।

Thursday, February 12, 2009

वेलेन्‍टाइन और युग भ्रम

'' वेलेन्‍टाइन डे'' हर वर्ष देश में एक नये आतंक का आगाज कर रहा है। कोई इसके पक्ष में तो कोई इसके विपक्ष में स्‍वयं को खडा कर अपने को समय सापेक्ष घोषित करने में लगा है। नये युग में नयी नयी सामाजिक दूश्‍चक्र व विक़तियां उत्‍पन्‍न हो रही है। इसमें स्‍वयं को उलझा कर देश का युवा वर्ग अपने आपकों नये संकट व तनावों की ओर ले जा रहा है. 21 सदी के युवा इस प्रकार के युग भ्रम का शिकार न हो, राष्‍ट्रीय मर्यादा व उन्‍नति की दिशा में अग्रसर हो कुछ ऐसा होना चाहिये। मर्यादा पुरूषतोम श्रीराम के नाम पर संगठन खडा करना, उसके बाद हिंसा उत्‍पन्‍न कर समाज के एक वर्ग में आतंक पैदा करना, फिर गलथेथरई करते हुए अपने आपकों धर्म के साथ जोडना जहां विक़त मानसिकता का द्योतक है, वही युवाओं के किसी समुह विशेष्‍ा का उसके प्रतिरोध में गुलाबी चडढी अभियान चलाना स्‍वयं में हास्‍यास्‍पद है। आखिरकार, इसका प्रतिफल क्‍या होगा। बाजार तो नये नये अवसर खडा करने की ताक में रहता ही है, आप किसी भी अभियान का हिस्‍सा बने, वह आपके आर्थिक सामाजिक दोहन में कब लग जाता है आपको पता भी नही चलता। सामान्‍य आदमी जिसे न तो वेलेन्‍टाईन से मतलब है न किसी सेना व संगठन से वह हंसता रहता है। देखिए ये दोनों किस प्रकार की मुर्खता उत्‍पन्‍न कर रहे है. कई बार हम पश्चिम सभ्‍यता की अच्‍छी बातों को नजर अंदाज करते हुए,उसकी बुराईयों की आकर्षित होते चले जाते है. संस्‍कार,शुचिता व सभ्‍य आचरण को अपने जीवन का आधार बनाने वाला भारतवर्ष, वीर बलिदानियों का देश अपना भारत, मर्यादा पुरूषोत्‍तम, भगवती सीता की भूमि, नानक व कबीर की भूमि, हीर व रांझा की भूमि,सोनी व महिवाल की भूमि में वेलेन्‍टाइन के बिना प्रेम की कोई परिभाषा नही हो सकती । क्‍या भगवान क़ष्‍ण से बढकर भी कोई प्रेम के प्रतीक हो सकते है। जिनकी बांसूरी की धून पर नर नारी, जीव जंतू, पशु प‍क्षी सब मदहोश हो जाया करते थे। वह अलौकिक प्रेम जो भगवतसता से तादात्‍मय स्‍थापित करा देता है, जहां जन्‍म जन्‍म के बंधन टूट जाते है. संत वेलेन्‍टाईन कोई त्‍याज्‍य व्‍यक्ति नही है. लेकिन सोचिए कि क्‍या प्रेम का प्रदर्शन सिर्फ गिफट लेने व देने से संपूर्ण होता है, खुले आकाश या झाडियों में बाहुपाश में बंधने से होता है, स्‍वतंत्र विचारधारा के नाम पर मर्यादा को ताक पर रखने से होता है। अगर ऐसा है भी तो क्‍या हम माने कि प्रेम प्रदर्शन की चीज है। हवा को सिलेंडर में भरकर आप आक्‍सीजन नाम देकर किसी को जरूरत मंद को जीवन प्रदान कर सकते है लेकिन जिसे स्‍वच्‍छ वायु में श्‍वास लेना हो वह सिलेंडर ढूंढे तो उसे क्‍या कहेंगे. विश्‍व को मागदर्शन देने की तैयारी में खडा भारत अगर इसी प्रकार के विरोध व तनावों में उलझा रहेगा तो अनावश्‍यक समय व उर्जा की बर्बादी से कुछ खास हाथ लगने वाला नही. आईए इससे इतर हम वसुधैव कुंटुबकम को अपनाते हुए पूरी मानवता को प्रेममय कर दें.

Monday, February 2, 2009

बदलते समाज में सर्वहारावर्ग की चिंताएं

वक्‍त बदल रहा है। कल तक जो चेहरे सामान्‍य दिखते थे, उनके उपर बडी बडी कंपनियों की क्रीम पुत गयी है। जीवन जीने की जददोजहद बढ गयी है। उदारीकरण के दौर में जहां सभी देश एक दूसरे की ओर निहारा करते थ्‍ो, आज एक साथ मंदी की चपेट में लुढकते नजर आ रहे है। अमेरिका के राष्‍ट्रपति का चेहरा ही सिर्फ नही बदला है बल्‍िक पहले अश्‍वेत बराक ओबामा के आने से दलितों व अभिवंचित समुदाय में उम्‍मीदें बढी है। अपने देश भारत में भी 19 वीं शताब्‍दी में समाजवाद का दौर चल रहा था। आम लोगों को ध्‍यान में रखकर नीतियां गढी जा रही थी। आज उदारीकरण के दौर में प्रवेश करने के बाद हम उद्योगपतियों का ख्‍याल रख रहे है। हमें डर है कि गरीबों की ओर हमने मुख किया तो हमारी सारी प्रगति व विकासवाद का पैमान टूटकर बिखर जायेगा। सर्वहारावर्ग आज दो दो कौडियों को जोडने में अपनी सारी उर्जा लगा रखा है। उसे पता है कि अपना बेटा अगर कंप्‍यूटर नही सीखेंगा, मोबाइल का प्रयोग करना नही जानेगा तो आने वाले समय में उसके लिए जीवन जीना और भी कठिन हो जायेगा। चांदी व सोने के चमचमाते मेडलों को खेल के मैदान में जीतने के लिए उसे कब्‍बडी, खो खो, या अपने देशी खेलों की जगह क्रिकेट, टेनिस या शूटिंग के कारनामे सीखने होंगे। उसके लिए न तो घर में न समाज के किसी भी हिस्‍से में अपनी उपयोगिता नजर आती है. बढती स्‍पर्द्वा के बीच उसकी हौसलाअफजाई के लिए भी कोई सामने नही आता. कोई आता भी है तो कारपोरेट बाबाओं की टोलीयां आती है. उन्‍हें रंगीन स्‍क्रीन पर अपने मीठे बोलों को सुनाने से फुसरसत कहां है. प्रभु को भी कैसे सीडी व बिडियों में बांध दिया गया है. साहित्‍य की जितनी विधाएं थी, सस्‍ती पु‍स्‍तकों की उपलब्‍धता थी वह दूर की चीज हो गयी है. अब प्रेमचंद को पढने के लिए, निराला को गुनने के लिए, विश्‍व साहित्‍य की सर्वश्रेष्‍ठ क़तियों को आत्‍मसात करने के लिए उत्‍तम साधनों का अभाव हो गया है, यह आम लोगों की पहुंच से बाहर हो गयी है. यही कारण है कि ईदगाह का हामिद अब नही मिलता, झूरी के दो बैल आपस में नही बतियाते. वक्‍त बदल रहा है. नि संदेह प्रेम की गाथाएं नयी गढी जा रही है लेकिन कभी वो मटुकनाथ तो कभी चांद मोहम्‍मद के अंजाम पर जाकर स्थिर हो जाती है. अब तो श्‍वास लेना भी मुश्किल होता जा रहा है. नवजागरण कालीन पत्रकारों की देश भक्ति, अपने समाचार पत्रों के प्रति समर्पण लुप्‍त होता जा रहा है. कारपोरेट कंपनियों की भांति परिवार भी प्राइवेट लिमिटेड कंपनी में बदल रहे है. आज समझौता है कल टूटा तो अपनी राह इधर से उधर. भगवान बुद्व ने अंगुलीमाल डाकु के सामने आ गये थे, उनसे उसने कहा था ठहरो. बुद्व ने ठहरते हुए कहा था मै तो ठहर गया तुम कब ठहरोगे. आज भी यही शास्‍वत प्रश्‍न है. सब कुछ बदल रहा है हम कब ठहरेंगे.

Friday, January 30, 2009

ट्रस्‍टी बनाम फ्रस्‍टी जर्नलिस्‍ट

पत्रकारिता की दूनिया में अजीबो गरीब घटनाएं होती रहती है। कई बार आम आदमी को इससे कोई मतलब नही होता, उन्‍हें प्रकाश में भी अमूमन नही लाया जाता। इन घटनाओं की फेहरिस्‍त सामने आ जाये तो दूनिया को मौजूदा पत्रकारिता के उनसे संबंद्व पत्रकारों की सोच व समझ में खालीपन की अनुभूति हो सकती है। हाल ही में पटना के पत्रकारों ने या यूं कहे कि जर्नलिस्‍टों ने ट्रस्‍ट बनाकर प्रेस कल्‍ब आफ पटना की स्‍थापना करने की सोची। राज्‍य के मुखिया के कानों तक यह बात पहुंची,उन्‍होने झटपट इस पर अपनी सहमति प्रदान करते हुए अधिकारियों को एक अदद अच्‍छे भवन सुसज्जित करने का निर्देश दे दिया. स्‍थान भी चिन्हित कर लिया गया. भवन में तेजी से कार्य शुरू हो गये. रंग तब जमा जब ट्रस्‍ट के साथ राज्‍य के सूचना जनसंपर्क विभाग ने बैठक कर उसे सौंपे जाने को लेकर वार्ता शुरू की. बैठक में मौजूद कई पत्रकारों ने जमकर ट्रस्‍ट के पत्रकारों की खबर ली. बात तू तू मैं मैं तक पहुंच गयी. अधिकारी हक्‍के बक्‍के थे. अब क्‍या होगा इनका. जो पत्रकार वहां धीरे धीरे पहुंच रहे थे उनसे पूछा जाने लगा की आप ट्रस्‍टी है या फ्रस्‍टी. फ्रस्‍टीयों की जमात अधिक थी. बहरहाल बैठक में सर्व सम्‍मति से निर्णय किया गया कि एक समिति बनायी जाये,जो लोकतांत्रिक तरीके चुनाव कर क्लब के संचालन की जिम्‍मेवारी ले. इसके लिए सूचना जनसंपर्क के अधिकारियों को अधिक़त किया गया कि वे समिति का गठन करें. बैठक के बाद बाहर निकल कर अलग अलग पत्रकारों की राय भिन्‍न भिन्‍न थी. उन रायों में जाने का कोई मतलब यहां नही है, अनावश्‍यक आप भी परेशान होंगे। वैसे, आकलन करें कि अचानक नयी सरकार के विकासवाद से प्रभावित होकर क्‍यूं प्रेस क्‍लब के स्‍थापना की सूझ जगी. वह भी वैसे पत्रकारों को जो इसके लिए बनाये गये स्‍व निर्मित ट्रस्‍ट के आजीवन सदस्‍य बने हुए थे. कही यह नीतीश जी के गले की हडडी न बन जाए.

Thursday, January 29, 2009

श्रीलंका सरकार की कार्रवाई से सबक ले भारत

भारतीय नीति निर्धारकों को श्रीलंका में लिटटे के खिलाफ के विरूद्व छेडे गये अभियान से सबक लेनी चाहिये। श्रीलंका सरकार द्वारा चलाये जा रहे अभियान का दूरगामी असर होगा। किसी भी मूल्‍क में आतंकवादी गतिविधियों, उग्रवादी गतिविधियों के संचालन को जोरदार तरीके से कुचल देना चाहिये। ये कौन लोग है जो मनमाफिक परि‍णामों को प्राप्‍त करने के लिए एक बडी आबादी को निरीह जनता को आतंक व भय के साये में रहने को मजबूर कर देते है। हमारी सेना व नीति निर्धारकों के बीच बेहतर तालमेल की बात की जाती रही है, निसंदेह ऐसा है भी तभी भारतीय लोकतंत्र 60 वर्षो के बाद भी अपने पैरों पर मजबूती से खडा है। लेकिन यहां गौर करने की बात यह है कि जम्‍मू कश्‍मीर हो या आसाम,जहां वर्ष भर युद्व व तनातनी की स्थिति बनी होती है. झारखंड व छतीसगढ के जंगलों में पल रहा उग्रवाद हो जिसका शिकार न केवल सरकारी मशीनरी होती है बल्कि आम जनता भी तबाह व बरबाद होती है. उनकी ओर भी ध्‍यान दिया जाना आवश्‍यक है. लोकसभा चुनाव होने को है एक बार फिर भारतीयों को अपने प्रतिनिधियों के चुनाव का अवसर प्राप्‍त होगा। क्‍या हम इस दिशा में कुछ नहीं सकारात्‍मक कार्य कर सकते है। अच्‍छे लोगों की राजनीति से दूराव न हो बल्कि वे सामने आकर राजनीति के समक्ष खडी चुनौतियों का सामना करें। ऐसा प्रयास नही किया जाना चाहिये। बुद्विजीवी वर्ग क्‍यों नही अपने देश के युवाओं को भरोसे में लेकर उन्‍हें आगे बढने का मौका देता है। इतना तो निश्चित है कि युवा वर्ग अपनी परेशानियों को निकटता से महसूस कर रहा है। उसे पता है कि श्रीराम सेना के नाम पर आतंक फैलाने वाले व तालिबानी मानसिकता से ग्रसित लोगों में क्‍या समानताएं है. हद तो यह है कि हमारे देश में लोकतंत्र के चारों प्रहरी विधायिका, कार्यपालिका, न्‍यायपालिका व प्रेस अपने वजूद के संकट से जूझ रहे है, उन्‍हें यह एहसास ही नही हो रहा है कि जिसे हम आम आदमी कहते है उसके जीवन की रोजमर्रा की जरुरते कैसे पुरी हो,उसमें उनका क्‍या योगदान हो सकता है. हम जिसे चाहे गालियां दे ले, चाहे जितनी भी शिकायते कर ले, लेकिन हमें थोडी थोडी ही सही अपने लिए न सही उन आम आदमियों के लिए ही सही करने का प्रयास करना चाहिये जिनकी आंखों के आंसू रुकते नही, सूख जाते है, इसी आशा में कि कोई तो तारनहार आयेगा, उनकी परेशानियों को समझेगा, उन्‍हें अपने मूल्‍क व अपने परिवार के लिए कुछ करने की थोडी स्‍पेश, स्‍थान प्रदान करेगा.

Tuesday, January 27, 2009

थोडी सी शर्म व आत्मालोचन

इस देश को कौन संचालित करेगा गणतंत्र या भीड़तंत्र या इन सब से इतर छिपे हुए चेहरों के बीच अपने असली चेहरों को भूल गये लोग. अगर आपका अंतःकरण अशुद है तो बाहरी आवरण बहुत दिनों तक किसी को उल्लू नही बना सकता. अजब सी सियासत है इस देश की जब आतंकी वारदात के खतरों से देश जूझ रहा हो,सीमा पार से गर्म हवाए आ रही हो, गणतंत्र दिवस के अवसर पर शहीदों को अशोक चक्र व अन्य सम्मान प्रदान किये जा रहे हो, नासिक के एक विद्यालय में गणतंत्र दिवस समारोह को तोड़ फोर कर बंद करा देना,महज इस लिए की भोजपुरी गीत की प्रस्तुति हो रही थी,बडे ही शर्म व शोक की बात है- कैसे किसी का दिल इस बात की गवाही देता हैं की जिस घर में हम रहे उसी घर में अपने हाथो से आग लगा दे । इस देश को ऐसे लोगो से निजात मिलनी चाहिए,जो किसी भी प्रकार की वैमनस्यता फैलाते हो । ६० वे गणतंत्र को करीब से जी भरकर देख लो, इसकी हड्डियों में भरपूर जवानी हैं, यह वही मुल्क हैं जहा ८० वर्ष के बाबु वीर कुवर सिंह ने अंग्रेजो के दांत खट्टे का दिए थे, १८५७ की क्रांति में एक बड़े भूखंड को विजित कर अपने प्राण त्यागे थे। अब हमें उन कमजोरियों की पहचान करनी चाहिए की कौन से तत्व हमें अन्दर व बाहर से खोखला बना रहा हैं। बंद करे यह भाषा, प्रान्त, मजहब और निर्ल्लाजता की बाते। देश की ६० फीसदी आबादी में शामिल युवा किसी भी देशद्रोही को बर्दाश्त कराने की हालत में नही हैं। यहाँ आपको तय करना होगा की आने वाली संतति को आप कैसा मुल्क सौपना चाहते हैं। क्या सुभाष ने इसीलिए अपना घर बार त्यागा था। गाँधी ने रामराज्य का सपना देखा था। बिस्मिल की कुर्बानी यु ही जाया हो जायेगी। विचारे, क्यों सच्चा देश भक्त मुस्लमान भी दहशत गर्दी के विरूद्ध जुबान खोलने में समर्थ नही पाता,क्यों किसी भी खास भाषा प्रान्त के नाम पर भीड़ तंत्र अँधा बन कर विवेक खो बैठती हैं, गणतंत्र किनारे खड़ा सिसकता रहता हैं। हम अपना अनुशासन कहा भंग करते हैं। कभी इस देश की गरीबी के आकडे इक्कठे किए जाते हैं, उन्हें गीत ,कला , अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर बेचा जाता हैं, तो कभी कभी अनकर देखही लाल आपण फोरी कपार को प्रदर्शित किया जाता हैं ।हम अपने आप पर इस देश पर यहाँ की मिटटी पर कब गर्व करना सीखेंगे.

Saturday, January 10, 2009

मीडिया की भूमिका पर उठते सवाल

हिंदी पत्रकारिता अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रही है. सारे सिद्वांत व नियम बाजारवाद के आगे नतमस्‍तक हो गये है. दिग्‍गज पत्रकारों को भी नही सूझ रहा कि आखिर इसका क्‍या समाधान होगा. स्‍टील, प्‍लास्टिक, आयल,फूड प्रोडक्‍ट की तरह ही बाजार हिंदी पत्रकारिता को अपने अनुरूप मोड रही है. ऐसा नही कि इससे मनोरंजन व सूचना से संबंद्व अन्‍य उद्योग जैसे फिल्‍म, टेलिविजन व संचार कंपनियां प्रभावित नही हो रही है. उनमें भी इसका खासा असर दिख रहा है. आम आदमी अपनी पहचान इनमें तलाशने की कोशिश कर रहा है. सावधान हो जाये, अगर एक आम आदमी गति मति बिगडेगी तो शायद उससे इतर खास आदमी प्रभावित नही होगा ऐसा नहीं है. समाज की एक कडी कमजोर होगी या टूटेगी तो दूसरा पक्ष निसंदेह प्रभावित होगा. खासकर, राष्‍ट्रीय मुददों पर हिंदी मि‍डिया के रूख्‍ा को समझना मुश्किल हो रहा है. पूरे तथ्‍य अब खुल कर सामने आ रहे है. चैनलों पर आतंकवाद के विरोध में भले ही चिल्‍लाकर अपनी प्रतिबद्वता को प्रदर्शित करने का दौर जारी है किन्‍तु यह भी सत्‍य है कि आम हो या खास मीडिया के रवैयें से स्‍वयं आतंकित है. उससे नही लगता कि मीडिया के पास जाकर किसी की समस्‍या का सामाधान ढुढा जा सकता है. चाहे अपराध की बात हो या ज्‍योतिषीय समाधान की यह समझ से परे है कि कैसे चंद मिनटों के प्रदर्शन के बाद किसी को भी कैसे खबर का असर प्राप्‍त हो सकता है. जब तक मूल समस्‍याओं को निबटाने को लेकर राष्‍ट्रीय नीतियों पर तीखे चोट करने,उसकी अच्‍छाईयों को जन जन तक प्रसारित करने की दिशा में कार्रवाई नही की जायेगी तब तक समस्‍याएं मुंह बाये खडी रहेंगी. आतंकवाद एक बडा मुददा है. यह पूरे देश को अपनी आगोश में लेने के लिए बेताब है. पडोसी मूल्‍कों से हमारे संबंध पुराने ढर्रे पर बने हुए है. इनकी लगातार समीक्षा होनी चाहिये. अटल जी ने क्‍या खूब कहा था कि हम नये नये दोस्‍त बना सकते है लेकिन पडोसी नही बना सकते. हमें अपने पडोसियों के सुख दूख उनकी समस्‍याओं में साझीदार होना सीखना होगा. मीडिया को इस दिशा में भी फोकस करनी चाहिये कि पडोसी मूल्‍कों में कौन कौन सी समस्‍याएं है. उनके समाधान की दिशा में अंतर्राष्‍‍ट्रीय प्रयासों को भी बल देना होगा. मीडिया एक ओर आम आदमी से आतंकवाद के विरूध खडे होने की अपील कर रहा है ऐसे में उसे आम आदमी के विश्‍वास को भी जीतना होगा. वैसे भी निजी प्रक्षेत्र के इलेक्‍ट्रानिक मीडिया की पहुंच मध्‍यम वर्ग में भी फिलवक्‍त शतप्रतिशत नही है. अखबारों को अपने तेवर में परिवर्तन लाने के पूर्व ठहर कर सोचना होगा कि बाजारवाद कही देश को पतन की गर्त में लेकर न चला जाये. हमें पश्चिमी मूल्‍कों में पूंजीवाद के विकास के दूष्‍परिणामों की ओर भी देखना होगा.

Saturday, January 3, 2009

नव वर्ष में अज्ञात भय से मुक्‍त हो

नव वर्ष का आगाज हो चुका है, बीते वर्ष की बिदाई व नये वर्ष के आगमन के बीच कई लोगों ने अपनी अपनी प्राथमिकताएं तय की होगी. बीते वर्ष की समाप्ति आतंकवाद के भीषण रुप को सामने लेकर आया. जबकि कई अच्‍छी बातें भी देखने को मिली थी. अच्‍छी बातों को याद करने से प्राय लोग कतराते है. खैर, आम मानसिकता की तरह ही हम भी उसी पर बातें करते है. प्राय देश के खास ओ आम लोगों के मन में पाकिस्‍तान की बातें आते ही,अपने देश में निवास करने वाले अल्‍पसंख्‍यकों को लेकर धारणाएं बनने बिगडने लगती है. हद तो यह है कि कई बार अल्‍पसंख्‍यकों के मन में ऐसा अज्ञात भय पैदा हो जाता है, मानों उनका भारतीय गणतंत्र से कोई वास्‍ता नही है. जाति व धर्म से उपर उठ कर सोचने व विचार करने का जज्‍बा अब भी अपनी शैश्‍वावस्‍था में ही है. वेद व कुरान की गुढ बातें न तो बहुसंख्‍यक समझते है, न अल्‍पसंख्‍यक. चूंकि अल्‍पसंख्‍यको में मुसलमान निशाने पर होते है, इसलिए पहले हम जान ले कि मुसलमान वस्‍तुत है कौन. मुसलमान, मुस्‍सलसल हो ईमान जिसका वही सच्‍चा मुसलमान है. जो अपने ईमान पर अडिग रहता हो. आप स्‍वयं देखें कि कितने ऐसे मुसलमान है जो अपने ईमान पर कायम रहते है. खासकर, अल्‍लाह( ईश्‍वर ) पर ईमान लाने वाला व्‍यक्ति कैसे बिना सिर पैर की सोच रख सकता है. दूसरा, वेद की ऋचाएं व कुरान की आयतों को गौर से पढे. कई बातें एक दूसरे को दुहराती प्रतीत होती है. वेद के अंतर्गत सूर्योपासना पर बल दिया गया है तो सूर ए जिन की चर्चा किस कदर उससे अभिन्‍न है यह भी देखें. खैर, गुढ रहस्‍यों की विवेचना यहां मेरा उदेश्‍य नही है. यह जो अज्ञात भ्‍ाय है उससे कैसे हम निकल सकते है, इस पर हमें विचार करना चाहिये. हमें इस पर विचार करना चाहिये कि जिस इस्‍लाम में ढुढ ढुढ कर बुराईयों की खोज की जाती है, उसी के मानने वाले पीर व फकीरों के दरबार में क्‍यों जाति और मजहब भूलकर सभी बंदे अपना सिर झूकाते है. क्‍यों वहां हर हदय भयरहित हो जाता है. क्षेत्रीयता, भाषाई संकीर्णता, धार्मिक कटटरता, आतंकवाद इत्‍यादि हमें थोडी देर के लिए भले ही डराते हो, इससे खबराना नहीं है. भारत भूमि पवित्र आत्‍माओं की निवास भूमि है. यही कारण है कि शक, हूण, कुषाण से लेकर इस्‍लाम व ईसाईयत ने भी यहां आकर अपना बसेरा बनाया है. आप और हम रहे न रहे यह मूल्‍क रहेगा. इसकी खुशबू दिनों दिन विश्‍व में बिखरती रहेगी, बशर्ते हम अपनी भावनाओं में पवित्रता, भाईचारगी, खुदा ईश्‍वर, गुरू, जिसे भी आप अपना पथ प्रदर्शक मानते हो उनमें आस्‍था बनायें रखे. प्राचीन भारत के अंश भाग चाहे गंधार अब अफगानिस्‍तान, बन जाये या गुरू नानक की जन्‍मभूमि ननकाना साहिब पाकिस्‍तान का अंश हो जाये, बुल्‍लेशाह के भजन हो या मीरा की भूमि उसकी गूंज बहरे को भी ईश्‍वर का ध्‍यान कराती रहेगी, आईए इस नये वर्ष में हम भयमुक्‍त होकर जीना सीखें. ऐसे किसी भी तत्‍व को प्रश्रय न दे जो देश की एकता व अखंडता को खतरे में डालने का प्रयास करता है. आर्यावर्त की इस भ‍ूमि पर भरत बचपन से ही शेर के मूंह में हाथ डालकर उसकी दांतें गिना करता है. अपनी संवेदनाओं को जाग्रूत करें, वतन पर कुर्बान होने का मौका विरले को ही प्राप्‍त होता है. अमर शहीदों की इस भूमि अशफाक, भगत सिंह, महात्‍मा गांधी, विवेकानंद की भूमि के कण कण में शक्ति विराजमान है.

Saturday, December 27, 2008

मीडिया की मजबूरी या देश की जरूरत है युद्व

आज भारत पाकिस्‍तान के रिश्‍ते में तल्‍खी है, एक आतंकवाद के खात्‍मे के लिए देश दूनिया में अपनी आवाज बुलंद कर रहा है तो दूसरा उसका पोषक बनने के लिए किसी भी सीमा तक जाकर अपनी युद्व की ज्‍वाला को शांत करना चाहता है. उसे युद्व लडकर विश्‍व की सहानुभूति प्राप्‍त करना श्रेयस्‍कर महसूस हो रहा है. मीडिया इसमें अपनी भूमिका तलाश कर रहा है. उसे बाजार को उपलब्‍ध कराने के लिए दमदार खबरे परोसने का मौका मिल गया है तो दूसरी ओर यह कमोबेश देश की जरूरत भी बतायी जा रही है. समय समय पर कुटनीतिज्ञों को आमंत्रित कर तरह तरह के विचार प्रसारित कर जनता को भ्रम की स्थिति में डाला जा रहा है. भारत द्वारा दिये गये 30 दिनों के अल्‍टीमेंटम के बाद भी पाकिस्‍तान अपनी स्थिति से टस से मस नही हो रहा है. पाकिस्‍तान के हिताकांक्षी राष्‍ट्रों में इसको लेकर भले ही बाहर से कोफत बढती द‍िख रही हो लेकिन अब भी चीन, साउदी अरब सहित अन्‍य पाकिस्‍तान परस्‍त राष्‍ट्रों ने अपनी स्थिति साफ नहीं की है. यह तो तय है कि पाकिस्‍तान के साथ युद्व हुआ तो इस बार उसका बजूद ही खतरें में पड जाएगा. फिर हमें अपनी सेना को विजित क्षेत्रों को वापस लौटने के बजाय व़हतर भारत के परिकल्‍पना को साकार करने के एजेंडे पर लगा देना होगा. आज पख्‍तुन, सिंधी पाकिस्‍तानी हुकमरानों के दोरंगी नीतियों के सबसे बडे पीडित है उन्‍हें लोकतांत्रिक अधिकारों से महरूम किया जा चुका है. पश्चिम पाकिस्‍तान में तालिबान का कब्‍जा है. वहां महिलाओं को शिक्षा प्राप्‍त करने के अधिकार से वंचित कर दिया गया है,वही मनोरंजन के साधनों का खात्‍मा कर दिया गया है. क्‍या इस्‍लाम की इस तरह की व्‍याख्‍या करने वालों से स्‍वयं इस्‍लामी जगत के रहनुमा निबटने में अक्षम है. प्रश्‍न यह उठता है कि क्‍या हम मीडिया के दबाब में युद्व की रणनीति अपनाए या किसी सार्थक समाधान की दिशा तलाशे. भारत सरकार की विदेश नीति पर पहले भी सवाल खडे होते रहे है, आज हमारा देश आजादी के 60 वर्षो के बाद इतना सशक्‍त हो चुका है कि विश्‍व के किसी भी दबाब से निबटने में सक्षम है. मीडिया को हमें अपनी ताकत के मूल्‍यांकन में सहयोग कर देश को भरोसे में लेने का प्रयास करना चाहिये न कि युद्व की बदलती व बढती भूमिका को स्‍पष्‍ट करने में अपनी उर्जा को खपाना चाहिये. हमारे देश में अब भी नीति निर्धारकों के बीच बेहतर सामंजस्‍य है, हमें उन पर भरोसा करना भी सीखना होगा. मीडिया को सलाहकार की भूमिका में ही रहना शोभा देता है वह निर्णायक बनने का प्रयास न करें.

Sunday, December 21, 2008

युद्ध या कूटनीति

देश आज किन भूल-भूलियो में भटक रहा है यह तो नियंता ही जाने यह स्पस्ट है कि आतंक से मुकाबला करने कि लिए युद्ध या कूटनीति में से तत्काल एक को चुनना होगा. युध का रास्ता अपनाने कि पहले हमे अपनी कूटनीति की ओर देखना होगा.यह हमें भटकाने वाला नही होगा बल्कि ठीक निशाने को भेदने में सहायक होगा. भारत में चन्द्रगुप्त मौर की विजय पताका लहराने वाला मगध साम्राज्य का इतिहास इसका गवाह है की कैसे युद्ध लड़ी जाती है.कैसे अपने देश कि एकता की बदौलत दुश्मन को परस्त किया जाता है. एक अदना सा दिखने वाला गुरु चाणक्य ने बालक चन्द्रगुप्त को देश का सम्राट बना दिया.टुकडो में बिखरे भूखंड को गुलसन बना दिया.इंदिरा जी ने पाकिस्तान से युद्ध करने कि पूर्व अन्तराष्ट्रीय स्तर पर अपनी भावनाओ से अवगत कराया था. पाकिस्तान ने माना तो ठीक ,नहीं तो उसे दुरुशत कर दिया.पाकिस्तानी कट्टर पंथियों ने सबसे अधिक अत्याचार सिंधियों पर कर रखा है. उसे मुक्ति दिलाना जरुरी है.

Wednesday, December 10, 2008

आतंकवाद का सरलीकरण,भाजपा की शिकस्‍त

हाल ही में पांच विधान सभा चुनावों के परिणाम सामने आये। यह संयोग ही है कि मुंबई की आतंकी घटनाओं के बीच पांच राज्‍यों छतीसगढ, मध्‍यप्रदेश, राजस्‍थान,मिजोरम व दिल्‍ली में चुनावों के दौरान राजनेताओं की सरपट दौड जारी थी। कमोबेश जम्‍मु कश्‍मीर में भी चुनाव के दौरान राजनेताओं की अच्‍छी खासी भागेदारी रही है. इन सभी स्‍थानों में जनता ने बडी ही बारिकी से राजनीतिक दलों का चुनाव अभियान को देखा. भारतीय जनता पार्टी को पांच राज्‍यों के चुनाव परिणामों में थोडी निराशा हाथ लगी है। इस पर भी वो अगर समय रहते सचेत नही होती तो संभव है एक बार फिर लोकसभा के चुनाव में अगले पांच वर्षो के लिए हासिए पर ही स्थिर रह जाए। दरअसल भाजपा ने विध्‍ाान सभा चुनाव में आतंकवाद को प्रमुख मुददा बनाया. पोटा कानून को हटाये जाने तथा अफजल को अबतक फांसी नहीं दिये जाने के मामले को हवा दी. आतंकवाद को इतना सरलीकरण आम जनता को तनिक भी नही भाया।आखिर हम कबतक इतने अगंभीर तरीके से किसी बडी समस्‍या को देखते रहेंगे. देश की एक अरब से अधिक की आबादी में मुसलमानों का हिस्‍सा 18 फीसदी के करीब है,शेष अन्‍य अल्‍पसंख्‍यक समुदाय की आबादी भी शामिल है. क्‍या देश के बहुसंख्‍यकों द्वारा अल्‍पसंख्‍यकों के मन से भय,डर व शक को बिना हटाये देश की राष्‍ट्रीय समस्‍याओं से निजात पाया जा सकता है। बहुलतावादी संस्‍क़ति वाले इस देश में हमारी एकजुटता ही विकास व समस्‍यों से मुक्ति का वायस बन सकती है। चाहे जो भी राजनीतिक पार्टी हो अल्‍पसंख्‍यकों की तुष्टिकरण करके सत्‍ता के गलियारे में पहुंचना चाहती हो, या बहुसंख्‍यकों की भावना को भडका कर अपना उल्‍लू सीधा करना चाहती हो, आने वाले समय में उन्‍हें घोर निराशा ही हाथ लगने वाली है। भारतीय गांधी युग में भी न इतने तंगदिल थे, न नेहरू युग में,अब तो देश के बंटवारे, राजनीतिक उथल पुथल, दंगे फसादों के दूष्‍परिण्‍ााम झेलते झेलते इतनी समझ विकसित कर चुकी है कि उसे आसानी से बरगलाया नही जा सकता। मुंबई में हुए आतंकवादी घटनाओं के बाद तो वह इतनी सर्तक हो चुकी है कि आने वाले दिनों में कांग्रेस,भाजपा,सपा या अन्‍य क्षेत्रीय दलों द्वारा किये जाने वाले कवायद को धूल चटा सकती है। राजनीतिक दलों पर नैतिक दबाब बन सकता है कि वे अच्‍छे उम्‍मीदवार दें, प्रशासन में पारदर्शिता लाए। राष्‍ट्रीय महत्‍व के प्रश्‍नों को गंभीरता से हल करें। इस बार के विधान सभा चुनावों ने राजनीतिक दलों को सचेत हो जाने का एक बार फिर मौका दिया है.

Tuesday, December 2, 2008

जरा सोंचे विचारें

हमारे देश की हरी भरी वसुंधरा को आतंकियों की नजर लग चुकी है। हम इतने लाचार साबित हो रहे है कि दुश्‍मनों के ठिकानों पर नजर तक नहीं जा रही है। सरहद के उस पार आतंकी बैठे कुचक्र रचते है,इस पार की सरकार तमाशबीन बनी होती है।कुटिनीतिक व राजनीतिक विफलता का ऐसा दुर्लभ नमूना अन्‍यत्र देखने को कम ही मिलता है। यह वही देश है जहां पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपनी शक्ति का लोहा पूरे विश्‍व को मनवाया था, विपक्ष्‍ा के नेता ने उन्‍हें दूर्गा के संबोधन से पुकारा था। क्‍या आज राष्‍ट्र की सुरक्षा व संरक्षा की कीमत पर ऐसी रणचंडी बनने का सौभाग्‍य किसी में नही है। हमारे देश की प्रथम नागरिक तथा यूपीए सरकार की निर्मात्री दोनो महिलाएं है।शायद इतिहास को इससे सुनहरा अवसर नही मिल सकता जब ठोस निर्णय लेकर देश के समक्ष एक अनुपम उदाहरण प्रस्‍तुत किये जा सके। हमारे देश में राजनेताओं के प्रति गुस्‍से का इजहार लगातार किया जा रहा है, ये नेता है कि मानते नहीं। क्‍या करना चाहते है व क्‍या बोल बैठते है. भारतीय लोकतंत्र बडी त्रासद स्थिति से गुजर रही है. आजादी के दीवानों ने ऐसा सोचा भी नही होगा कि एक अरब की आबादी इस कदर घुटने टेककर सिर्फ तमाशबीन बनी रह सकती है. देश की उन्‍नति की चाह रखने वाले दीवानों को अपने देश पर गर्व था, वे सर कटाना जानते थे, देश की आन बान व शान पर खतरा होने पर दुश्‍मनों को मुहं तोड जबाब देना भी जानते थे। क्‍या हिंदू क्‍या मुसलमान क्‍या सिख व क्‍या इसाई हमें अपने मादरे वतन से लगाव नही तो धर्म व अपने धर्म गुरूओं के उपर क्‍या सम्‍मान व लगाव होगा। जब हमीं न होंगे तो कौन हमारे धर्म व संस्‍क़ति की रक्षा करेगा। हमने साथ साथ जीना सीखा है साथ मरना भी जानते है। बहुत ही खूब भारतीय अंतरिक्ष यात्री राकेश शर्मा ने इंदिरा जी के एक प्रश्‍न का जबाब देते हुए अंतरिक्ष से कहा था अपना हिंदूस्‍तान उपर से सारे जहां से अच्‍छा दिखता है। इस धरती की खुबसुरती न केवल देखने में है, बल्कि की इसकी आत्‍मा भी उतनी ही सुंदर है। कुछ जयचंदों के होने से हम इसे कलुषित न होनें देंगे। सुरक्षा को लेकर पैसे वाले पावर वाले लोगों को कोई चिंता भले ही स्‍थायी न हो किंूत भारतीय आम नागरिक सहमे सहमे से नजर आ रहे है। आने वाले चुनाव में इस खामोशी का इजहार होना जरूरी है। भारतीय जनता के पास लोकतंत्रिक अधिकार के नाम पर वोट देने की प्रमुख शक्ति है। सारे मीडिया के आकलन व नौकरशाहों की कारगुजारियों के बावजूद, राजनेताओं को जो देश की अस्मिता के साथ खिलवाड करते नजर आते है,उन्‍हें बख्‍शा नही जाना चाहिये। हमें यह स्‍पष्‍ट संकेत देना होगा भारतीय राजनीति को कि इस्‍तीफे व गैर जिम्‍मेदारी भरे बयानात के आधार पर राजनेताओं को बचने का रास्‍ता अब नहीं दिया जा सकेगा। संकट की घडी में हमने यह स्‍पष्‍ट जाना है कि चमकने वाले चेहरों के भीतर कितना डरवाना चेहरा छिपा है. ये किस कदर सिर्फ व सिर्फ स्‍व हित के प्रति सोचते व विचार करते रहते है. वेशर्मी की हद तो यह है कि ये शहीदों को भी नही बख्‍शतें है. वतन पर मिटने वालों के साथ उनके परिवारों के साथ इस कदर बर्ताव करते है कि उन्‍ा पर कुछ भी टिप्‍पणी किया जाना अपने आप में शर्मनाक है.

Sunday, November 30, 2008

आतंकवाद और हमारी जबाबदेही

मुंबई में आतंकवादी हमले के कारण जो स्थिति बनी उसका असर प्रत्‍येक भारतीय जनमानस पर पडा है, इसे कमोबेश सभी प्रमुख ब्‍लॉगों पर प्रमुखता दी गयी है। खासकर, सिनेमा से संबंद्व प्रमुख कलाकारों के द्वारा लिखी गयी पंक्तियों को मीडिया ने भी तवज्‍जों दी है। सुपर स्‍टार अमिताभ बच्‍चन ने जहां एक ओर स्पिरिट आफ मुंबई कहना बंद करने की सलाह दी है, तो आम‍िर खान ने कहा कि आतंक का कोई धर्म नही होता। इसी प्रकार मीडिया से संबंद्व सभी स्‍तर पर लोगों ने चंद आतंकवादियों को खुलेआम तीन दिनों तक हंगाम,बर्बादी व तबाही का मंजर फैलाते देखा सुना। पिछले तीन दिनों तक हमें यह दिखा की आज भी राजनेताओं से ज्‍यादा हमारे देश की चिंता हमारे सुरक्ष्‍ाा बलों को है। वे अपने प्राण न्‍योच्‍छावर कर के भी लोगों को दहशतगर्दी से निकालना जानते है। हमारे राजनेताओं को इससे सीख लेनी चाहिये क्‍योकि अंतत यह देश ही हमारे आने वाली पीढियों के लिए,हमारे स्‍वजनों व परिजनों के जीवनयापन व विकास का साधन होगा। न तो भविष्‍य में जो आज काम आए उस सुरक्षा बलों के जवान रहेंगे, न अपने को निर्णायक व महत्‍वपूण् मानकर देश की शांति व सम़द्वि में हस्‍तक्षेप करने वाले राजनेता रहेंगे। यह ठीक है कि लोकतंत्र में सुरक्षाबलों व सेना के उपर जनता के प्रतिनिधि होने चाहिये ताकि जनपक्षीय दबाब उनपर बना रहे वे निरंकुश न हो, किंतू हमें यह भी तय करना होगा कि उन्‍हें देश व समाज हित में कार्य करने की पुरी स्‍वतंत्रता भी हो। सुरक्षा एजेंसिया अपने भीतर ही नियंत्रण की प्रणाली विकसित करें ताकि कार्य में लापरवाही बरते जाने वालों व देश की अस्मिता के साथ खिलवाड करने वालों से निबटा जा सके। उन्‍हें हुकूम का गुलाम बनाकर रखना देश के साथ धोखा है। इतना तो निश्चित है कि जो कौमें अपनी सुरक्षा के प्रति लापरवाह होती है उन्‍हें मिट जाना चाहिये। प्रक़ति ने एक चींटी को भी इतना ताकतवर बनाया है कि जब वह हाथी की सुंढ में घुस जाए तो उसकी मौत का वायस बन जाती है। हमें यह देखना होगा कि समाजिक संरचना का विकास हम किस प्रकार कर रहे है,उनमें राजठाकरे टाईप लोगों,सांप्रदायिक विद्वेष फैलाकर अपनी रोटी सेकनें वालों के उभरने की कितनी संभावनाएं है। पोटा या अन्‍य कानूनों की बात करने वालों को यह भी गौर करना चाहिये कि पहले से लागू किये गये कानूनों का क्‍या ह्रस हो रहा है। क्‍या सुरक्षा को लेकर हमने अपनी जिम्‍मेवारियों को समझा है. पूरे भारतीय परिवेश में मुंबई इन दिनों प्रतीक के रूप में उभरा है. कभी यहां शिवसेना की सांप्रदायिक राजनीति हावी होती है तो कभी राजठाकरे की क्षेत्रीयतावाद की राजनीति तो कभी अंडर वर्ल्‍ड के खौफ के साए में लोग दहशत में रहते है. यहां मीडिया का रोल भी कमोबेश उजागर हुआ है. तरूण भारत ने जहां हेमंत करकरे के पुत्र द्वारा नशीली दवाओं के सेवन करने संबंधी खबरे दी तो सामना ने हिंदू विरोधी अधिकारियों के नाम पते उजागर करने व शिवसेना कार्यकर्ताओं द्वारा उन अधिकारियों के घरों के बाहर प्रदर्शन करने संबंधी खबर प्रकाशित की. हद तो यह है कि हमेशा तेज गति से आगे रहने वाली इलेक्‍ट्रानिक मीडिया भी घंटों बाद इतने बडे हमले को समझ सकी. देश भक्ति का जजबा तो उनमें दूसरे तीसरे दिन ही आया. एक चैनल ने तो आतंकवादियों की तस्‍वीरे तक दिखा दी. खबर है कि जब बाहर पुलिस अधिकारी आतंकवादियों के शिकार हुए तो ताज के अंदर छिपे आतंकी जश्‍न मना रहे थे। सूचना के इस कदर लापरवाह होने का नतीजा यह भी हो सकता है कि विदेशों में बैठे आका इससे अगली रणनीति तय कर रहे हो। हमें अपनी सुरक्षा को लेकर किसी भी स्‍तर पर लापरवाही नही बरती चाहिये,खासकर यह जिम्‍मेदारी तय होनी चाहिये कि राष्‍ट्रीय विपत्ति के क्रम में,आतंकवादी गतिविधियों या बाहय आ‍क्रमण के समय बरती जाने वाली कोताही को किसी सूरत में बख्‍शा नही जायेगा। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक पूरे देश को ग़ह मंत्री शिवराज पाटिल के इस्‍तीफे व वित्‍त मंत्री रहे पी चिदंबरम द्वारा पदभार संभाले जाने की सूचना आ चुकी है। क्‍या यह वह समय नही है जब सिर्फ इस्‍तीफे को अपनी जिम्‍मेवारी से बचने का माध्‍यम भर न माना जाये बल्कि इस प्रकार की लापरवाही बरते जाने के लिए राजनेताओं को भी दोषी बनाया जाये. अतंत देश सबका है, देश की सुरक्ष्‍ाा की जिम्‍मेवारी सब पर है.

Saturday, November 29, 2008

वह पल जो ठहर सा गया...... कब रुकेंगे राजनेता

मुंबई में हुई आतंकवादी घटना को देख व सुनकर पूरा देश स्‍तब्‍‍ध रह गया।तीन दिनों तक राष्‍ट्र की धमनी में दौडता रक्‍त ठहर सा गया,एक एक पल आत्‍मचिंतन व चुनौतियों के प्रति अपनी जिम्‍मेवारी का एहसास कराता प्रतीत हुआ। क्‍या राजनेता, क्‍या अभिनेता,व्‍यवसायी,चिंतक,आम नागरिक सभी यह सोचने को बाध्‍य हो गये कि हमारे राजनेता आखिर कौन से कार्य में व्‍यस्‍त है जो उन्‍हें देश की आंतरिक सुरक्षा के प्रति लापरवाह बनाये हुए है. वैदेशिक नीति के उपर टीका टिप्‍पणी लगातार की जाती रही है किंतू क्‍या हम सचमुच बाहय आ‍क्रमण को झेलने के लिए सामर्थ्‍यवान है।आंतरिक सुरक्षा की बदहाल स्थिति को लेकर क्‍या ठोस रणनीति बनायी जा सकती है,इस पर कभी विचार किया गया है भी या नही।थोडी देर के लिए अपने नेत़त्‍वकर्ताओं के प्रति अपने मन को शिथिल भी कर ले तो क्‍या देश का प्रत्‍येक नागरिक इन आतंकवादी घटनाओं से मुकाबले के लिए मानसिक रुप से तैयार है. यह चिंता लगातार व्‍यक्‍त की जा रही है कि मुंबई में तीन दिनों तक आतंकवादियों द्वारा दहशत का महौल बनाये रखने के पीछे लंबी व ठोस रणनीति अपनायी गयी होगी। तो क्‍या हमारे लिए यह जानना जरूरी नही कि ऐसे मौकों पर हमें किस प्रकार प्रतिक्रिया देनी है। आक्रमण हमारी नीति नही हो सकती लेकिन क्‍या जो आक्रमण करें उसे चिन्हित करते हुए उस पर प्रत्‍याक्रमण करना हमारी नीति नही हो सकती। जो कायर कौमे होती है,वही इससे इंकार कर सकती है। भारतीय रक्‍त में इस प्रकार की कायरता का कोई स्‍थान नहीं है।हमें वैसे देशों को जो आतंकवाद या आतंकवादी गतिविधियों को प्रश्रय दे रहे है खासकर, हमारे पडोसी मुल्‍क उनको स्‍पष्‍ट रुप से यह एहसास दिलाया जाना जरूरी है कि वे संभल जायें अन्‍यथा परिण्‍ााम के लिए तैयार रहें। भारतीय सीमा में पहली बार किसी आतंकवादी गतिविधि के लिए सेना के अधिकारी पर लगातार किये जा रहे आरोप प्रत्‍यारोप, एक प्रांत के लोगों को दूसरे प्रांत में अपमानित किया जाना,आतंकवादी गतिविधियों के लिए चिन्हित किये जा रहे लोगों के साथ नरमी का रुख हमें लगातार कमजोर बनाता जा रहा है। क्‍या सिर्फ वोट व सत्‍ता की खातिर एक अरब लोगों का यह मुल्‍क इतना कमजोर हो सकता है। राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्‍वकाल में श्रीलंका में जितनी जल्‍दी सेना को भेज कर सफलता पायी गयी थी,या मालदीव में हुए तख्‍त पलट को जिस कदर त्‍वरित गति से सुलझाया गया था,क्‍या वह आज 08 आते आते इतिहास के पन्‍नों में गुम हो गया। देश के खुफिया संगठन को क्‍यो कमजोर बनाया जा रहा है,उन्‍हें स्‍वतंत्रता देकर क्‍यो नही उनकी रिपोर्टो पर आक्रमक रुख अपनाया जाता है. राज्‍यों की अपनी खुफिया विभागे है जो लुंज पूंज स्थिति में है. उन्‍हें आधारभूत सुविधाएं दी जानी चाहिये या नहीं इस पर क्‍यो नही महत्‍वपूर्ण निर्णय लिए जाते. मुंबई पुलिस की स्‍कॉटलॉड यार्ड से तुलना की जाती है,वह एक राहुल राज की हत्‍या करने में स्‍वयं को जाबांज घोषित करती है लेकिन मौका देश के दुश्‍मनों से भिडने का हो तो तीसरी पंक्ति में नजर आती है। मुंबई के राजनेता जो मराठी गैर मराठी के नाम की कुछ दिनों पूर्व तक माला जप रहे थे,उन्‍हें सांप सूंघ गया है। हिंदू मुस्लिम व अन्‍य कौमों में नफरत की आग उगलने वाले,फतवा देने वाले तथाकथित संप्रदायिकता विरोध के नाम पर अपना उल्‍लू सीधा करने वाले आज किस दूनिया में है यह किसी को पता तक नही है. क्‍या देश सिर्फ उनका है जो हाथों में हथियार लेकर देश के नाम पर शहीद होने के लिए तैयार है, या उनका भी है जो उनके परिवार के साथ शांति से समय गुजारना पसंद करते है. क्‍या देश के नीति नियंताओं को यह नही सूझता कि इस देश में शांति व सदभाव के बिना किसी प्रकार का विकास नामुमकिन है।वोट व सत्‍ता के पीछे पागल बने लोगों को अपने हाथों को मजबूत बनाने के लिए दूसरे विकसित देशों से उद्वाहरण लेना उचित नही प्रतीत होता. हम संविधान का निर्माण उधार लेकर दूसरे मुल्‍कों से कर सकते है,उसपर इतरा सकते है कि देखों दूनिया के बेहतरीन प्रणाली को हमने अपनाया है. तो क्‍या देश के दूश्‍मनों से निबटने के तरीके से नही सीख सकते,शांति व सदभाव से रहना नही सीख सकते, विज्ञान व तकनीक की प्रगति के लिए किये जाने वाले उपाय नही सीख सकते. आखिर कबतक हम अपने कांधों पर लाशों को ढोने के लिए मजबूर होंगे. मुंबई की घटना पर टिप्‍पणी करते हुए अमेरिकी रक्षा विशेषज्ञ ने क्‍या खूब कहा कि वर्तमान भारतीय ग़हमंत्री बेहद कमजोर है। उनसे ऐसी घटनाओं से निपटने को लेकर या पूर्व की तैयारी को लेकर बेहतर उम्‍मीद नही की जा सकती। यूपीए हो या एनडीए दोनों धडों को कम से कम देश हित में एक सुस्‍पष्‍ट नीति आतंकवाद को लेकर विकसित करनी चाहिये ताकि अव्‍वल तो ऐसे हालात न पैदा हो या संकट आए भी तो उससे कडाई से निपटा जा सके। गोली का जबाब गोली से देने की घोषणा करने वाले क्षेत्रीय राजनेताओं को भी सर्तक होकर अपने बयान देने चाहिये। प्रांत कमजोर होता है तो देश कमजोर होता है, लोगों को नागरिक अधिकारों के साथ कर्तव्‍यों की भी जानकारी देनी चाहिये। हमें छोटी छोटी बातों से उपर उठना सीखना होगा। कभी कभी तो अपने देश के लोगों के विचारभिन्‍नता को देखकर लगता है कि सचमूच यह कुपमंडूकता से उबरने में अभी तक नाकाम साबित होता रहा है. कोई तो हो जिसे राष्‍ट्रीय व जातीय श्रेष्‍ठता का अभिमान हो,सिर्फ मुठठी भर लोगों के द्वारा राष्‍ट्रगान गाये जाते रहे, या सिर्फ स्‍वतंत्रता अथवा गणतंत्रता दिवस के अवसर पर औपचारिकता निबाहे जाते रहे तो इन हालातों से निबटना मुश्किल है. अपने देश के स्‍कूल व कॉलेजों में नौजवानों को सैन्‍य प्रशिक्षण देने के लिए नेशनल कैडेट कोर एनसीसी की स्‍थापना की गयी है। यह प्रशिक्षण सुविधा देने मात्र का संगठन नहीं है बल्कि अपने देश को करीब से जानने व महसूस करने वाला संगठन है। आज राहुल गांधी को घूम घूमकर अपने देश को समझना पड रहा है काश, वे इसके माध्‍यम से प्रशिक्षित होते तो संभवतया उन्‍हें सैन्‍य बारिकियों के साथ,अपने देश की विविधता में छिपी एकता के भी दर्शन हो गये होते। कोई आवश्‍यक नही कि एनसीसी प्रशिक्षित सैन्‍य सेवा में ही जाये, देश के किसी भी भाग में, किसी भी कार्य में लगे युवाओं के जीवन में, व्‍यक्तित्‍व में यह युगांतकारी परिवर्तन ला देता है। सेना,पुलिस या वर्दी खौफ व आतंक पैदा नही करती बल्कि देशद्रोहियों, समाजविरोधियों का सर कुचलने में सहायक सिद्व होते हुए प्रतीत होती है.यह अच्‍छे राजनेता भी हमें दे सकती है.

Thursday, November 13, 2008

सोने की चिडिया स्‍वीस बैंक में कैद

भारत को कभी सोने की चिडियां कहा जाता था, यहां दूध की नदियां बहती थी,यह मात्र कपोल कल्‍पना भर नही थी। सचमुच उस समय भारत धन धान्‍य से भरपुर था।यहां से मसाले,सुती वस्‍त्र,स्‍वर्ण आभूषण,आयुर्वेदिक दवा इत्‍यादि कई अन्‍य जरूरत की चीजों का निर्यात किया जाता था। भारतीय व्‍यापारियों को बडे स्‍वागत के साथ विदेशों में आमंत्रित किया जाता था। आज का भारत इसके ठीक उलट है। आज भारतीय अर्थव्‍यवस्‍थ्ा विकास के घोडे पर सवार होने के बावजूद गरीबी का अभि शाप ढोने को अभिसप्‍त है। सोने की चिडियां आज स्‍वीस बैंक में कैद है। प्राप्‍त जानकारी के अनुसार स्‍वीस बैंकों में जमा राशि के पांच बडे स्रोतों में शामिल भारत के 1,456 अरब डॉलर,रूस के 470 अरब डॉलर,यूके के 390 अरब डॉलर,उक्रेन के 100 अरब डॉलर तथा चीन के 96 अरब डॉलर की मुद्रा स्‍वीस बैंक में कैद है। क्‍या ऐसा हमारे देश के नियति नियंताओं के सहयोग के बिना हो सकता है। क्‍या इसके लिए हमारे देश की आर्थिक नीतियां जिम्‍मेवार नही है। हद तो यह है कि स्‍वीस बैंकों में जमा राशि भारत के कुल राष्‍ट्रीय आय से डेढ गुना ज्‍यादा है तो भारत के कुल विदेशी कर्जो का 13 गुना है। इस राशि को वापस लाकर देश के 45 करोड गरीबों में बांट दिया जाये तो सब को कम से कम एक लाख रुपये मिलेगा।ऐसा नहीं कि इसमें सिर्फ बेईमान राजनेताओं के धन जमा है, इसमें उद्योगपतियों, फिल्‍म कलाकार, क्रिकेट खिलाडियों के साथ कई लोगों की राशि भी शामिल है। प्राप्‍त जानकारी के अनुसार इन बैंकों की खासियत यह है कि इसमें जमा राशि पर कोई टैक्‍स नही लगता, न ही जमाकर्ताओं के नाम व नंबर सार्वजनिक किये जाते है। अब आप ही विचार करें कि ऐसे बैंकों के कर्ताधर्ताओं को क्‍या कहा जाए देश के सुधारक, विकास की ओर ले जाने वाले पुरोधा, देश के आईकॉन, या गरीबों का रक्‍तचूषक. आज आप राजनीतिक उठापटक के बीच जो भी घात प्रतिघात कर लें, मुलायम कहें की सत्‍ता में आने पर मायावती की मूर्ति उखाड देगे, तो अगला कहेगा कि मुसलमानों को जन्‍नत नसीब करा देंगे,गरीबों को लॉलीपाप बांटेंगे, लेकिन सच यही होगा कि ये सब बरगलाने वाली बातें है. इनका न तो गरीबों के बच्‍चों के स्‍वास्‍थ्‍य,शिक्षा, उनके जीवन स्‍तर में सुधार से कोई दूर दूर तक संबंध है, न ही उनके माता पिता की आय में सुधार, उनका देश के विकास में सक्रिय भागदारी निभाने के अवसर प्रदान किये जाने से है. ये जो मिडिया हाउस है,भले ही गला फाड कर चिल्‍लाये कि ये हो रहा है, वो हो रहा है लेकिन सच्‍चाई इससे कोसों दूर है. हमारे जनप्रतिनिधियों के ड्राइंगरुम से निकलकर कोई बात आगे नही जाती.

Saturday, November 8, 2008

ब्‍लॉग लेखन क्‍या मीडिया के गटर की गंगा है

मेरी नजर अचानक एक ऐसे लेख पर पडी जिसमें ब्‍लॉग को मीडिया की गटर गंगा का हिस्‍सा बताया गया है. ऐसे में प्रश्‍न यह उठता है कि क्‍या ब्‍लॉग लेखन सचमुच इतना गंभीर नही है, इसके पाठक इसके बारे में क्‍या राय रखते है, इसकी समझ अब तक नहीं बन पा रही है. दूसरे अर्थो में यही समझा जा रहा है कि ब्‍लॉग सिर्फ मन की भडास मात्र है. मेरी राय में ऐसा नहीं है. खासकर, जब कोई पत्रकारिता जगत का व्‍यक्ति ब्‍लॉगिंग से जुडता है तो निसंदेह मेन स्‍ट्रीम में छुट जाने वाली बातों को रखने का प्रयास करता है. ये छूट गयी बातें मीडिया की गटर से निकली नहीं होती न ही गटर में फेंके जाने योग्‍य ही होती है. यह समझने वालों का भ्रम हो सकता है. साहित्‍य व पत्रकारिता के मेन स्‍ट्रीम में भी ऐसी बातें पायी जाती है, जो न सिर्फ गटर में फेंकी जाने वाली होती है बल्कि लगता है कि गटर से ही निकली हुई है. पाठक उसे वैसे ही ग्रहण करते है जिसके योग्‍य वो रचना होती है या उसकी अधिकारी होती है. कई ऐसे ब्‍लॉग है जो कई नई व रोचक जानकारी देते है. हमारा ज्ञानवर्धन करते है, कई ब्‍लॉग तो अपने आप में वि शद जानकारी तक उपलब्‍ध कराते है. जहां तक पत्रकारों के द्वारा अपने मन की खटास को इसमें टांके जाने की बात है, यह पत्रकार की अपनी अभिरुचि या क्षमता पर नि र्भर करता है कि वो अपने मन के वि ष, जहर को किस प्रकार औरों के लिए अम़त बना पाता है. हलाहल पीने वाले ही यह समझ सकते है कि अंम़त की जरूरत किसी कदर लोगों को होती है. जो अच्‍छा पढना, लि खना व समझना चाहते है, उन्‍हें ब्‍लॉग लेखन निश्चित रुप से अपनी ओर खींचता है, यह चालू भाषा में कहे तो बाथरूम सिंगर को गाने का एक बेहतर मौका फराहम करता है. यह समझने की बात है कि आप उस संगीत को कैसे लेते है. आपकी मौलिक प्रति भा का कैसे विकास होता है. कैसे आप अपनी जगह बना पाते है. पत्रकारिता के मेन स्‍ट्रीम में या सक्रिय लेखन के क्षेत्र में, कला साहित्‍य से इतर प्रत्‍येक कार्य में यही जददोजहद कार्य करती है. यही किसी को महान तो किसी को शैतान बनाता है.

टिप्‍पणी के लिए धन्‍यवाद

समाज में,साहित्‍य में, साहित्‍य के मंच पर जो कुछ घटता है उसे अपने नजरिये से मैने सामने रखा. निसंदेह उनपर अलग अलग टिप्‍पणियां होगी. जहां तक एक टिप्‍पणी कर्ता द्वारा उठाये गये प्रश्‍न की बात है, इतना निश्चित जानिये कि सबका अपने दायरे में काम करना ही अच्‍छा लगता है. आप किसानी बेहतर करते हो, साथ ही आपसे उम्‍मीद की जायें कि आप सेटेलाइट के भी ज्ञाता हो यह मुश्किल है. मैने कथाकार की पीडा को अभिव्‍यक्‍त करने का प्रयास किया. अब आगे बढने वाले सह़दय लोगों के हाथों से उम्‍मीद बनती है कि वे ऐसा कुछ करें ताकि कथाकार महोदय अपने कष्‍टों से उबर सकें. मेरा आशय किसी एक का कथाकार का नही ऐसे कई विद्वान व आचार्य धक्‍के खाते फिर रहे है उनकी नोटिस तक नही ली जा रही,पहले उन्‍हें नोटिस में लाना जरूरी हैं. क़पया इसमें कोताही नहीं की जानी चाहिये.

Saturday, November 1, 2008

हिंदी वालों की आंखों का पानी गायब

आज हिंदी प्रदेश के हिंदी सेवियों के आंखों का पानी गायब हो गया है. यह सब लि खते हुए ह़दय को बहुत कष्‍ट हो रहा है जो आज मैने अपने आंखों देखी है. आज दोपहर में पटना में साहित्‍य के नामचीन आलोचक व साहित्‍यकार डा नामवर सिंह द्वारा बिहार के तेजतर्रार मंत्री के प्राइवेट से‍केट्री अशोक कुमार सिन्‍हा लि खित पिता नामक पुस्‍तक का लोकापर्ण किया गया. इसमें साहित्‍य अकादमी पुरस्‍कार प्राप्‍त कवि अरुण कमल सहित कई ख्‍यात स्‍थानीय साहित्‍यकार व आलोचक शामिल थे. डा नामवर सिंह ने अपने संबोधन में स्‍पष्‍ट भी किया कि वे पूर्व से अशोक जी को नही जानते, आलोचक नंद कि शोर नवल जी के द्वारा जानकारी मिलने पर मैने इन्‍हें जाना. इस समारोह में बिहार के पांच से सात प्रमुख एमएलसी, वि धायक भी उपस्थित थे. पुरी गहमागहमी के साथ कार्यक्रम चला. मैं उस पर नही जाना चाहता कि किसने क्‍या कहा और बातों ही बातों में कटाक्ष के कितने दौर चले. लेकिन जो मूल बात है कि इसी समारोह में ख्‍यात कथाकार मधुकर सिंह भी उपस्थित हुए. हाल ही में उन्‍हें पक्षाघात की शिकायत हो गयी है. साहित्‍य प्रेम व कुछ मजबूरी और उम्‍मीदों के साथ वे समारोह में अपने पोते के साथ पहुंचे. उनके हाथों में मुख्‍यमंत्री व मंत्री के नाम पत्र था. उनकी इच्‍छा थी कि शायद उसपर कुछ लोग अपने हस्‍ताक्षर कर दें ताकि सरकार के पास भेजा जाये तो कुछ आर्थिक सहायता मिले ताकि रोग से लड सके,थोडी सी जीवन मिल जाये, कुछ और साहित्‍य को दे सके. लेकिन हाय, रे हिंदी के सुधी श्रोता व दर्शक सब के सब उस भीड में शामिल थे जिनके लिए नामवर के दर्शन मात्र से ही पूर्व कर्मो का पाप मिटने का भरोसा था. किसी ने भी मधुकर सिंह की ओर ध्‍यान नही दिया. धीरे धीरे सीढियां उतर कर वे अपनी राह चले गये.उनके कापतें हाथों से छडी कब छुट जायेगी यह किसी ने नही महसूस की. हिंदी प्रेमियों की यह ह़दयहीनता समझ से परे है. हिंदी वालों की आंखों में अब पानी सिर्फ तारीफ व तालियों के साथ प्रशंसा के सूनने के लिए ही रह गया प्रतीत होता है. मैं ये नहीं कहता कि समारोह न हो, लेकिन सिर्फ कुडा कर्कट के लिए नामचीन लोग सामने आ जाये और जो बेहतर ल‍ि खे जा रहे हो उन्‍हें प्रशंसा के शब्‍द तो छोडिये उन्‍हें कोई पूछने वाला न हो उधर आलोचक अपनी भ़कुटी ताने रहे यह सब हिंदी में ही देखने को मिलती है.

Monday, October 27, 2008

रिपोर्टिंग ऐसी जो पाठक मन भाये

वर्तमान हिंदी पत्रकारिता का परिद़श्‍य कुछ इस तरह बन चुका है कि पाठक के मन को लुभाने वाले समाचार को परोसने के नाम पर उलूलजूलल तथ्‍य परोसे जा रहे है. यह ध्‍यान रखा जा रहा है कि वह किसी को नुकसान न पहुंचायें चाहे वह भ्रष्‍टाचारी हो, अत्‍याचारी हो या देशद्रोही. आज की खबरों से न तो किसी का नुकसान पहुंचता है न वि शेष फर्क ही. पत्रकारित से प्रतिबद्वता,समर्पण व त्‍याग जैसे शब्‍द गायब हो चुके है. इसका प्रयोग किया भी जाता है तो प्रबंधकीय मिटिंगों में पत्रकारिता के तेवर को बचाये रखने के नाम पर पत्रकारों को घुटटी पिलाने मात्र के लिए ही. समाचार पत्र को संपादक नही बल्कि ब्रांड मैनेजर तय करने लगे है. ये ऐसे मैनेजर है जो नये संस्‍थानों से एमबीए की डिग्री लेकर बाजार में आ रहे है. इन्‍हें संस्‍थान को मुनाफे लाने के लिए किसी भी बात से गुरेज नही है. इन्‍हें इससे कोई खास मतलब नही कि रिपोर्ट से किसी की नींद उड जाती है या दिन का चैन खो जाता है. किसी भी भाषा वि शेष के पत्र हो उन्‍हें आप देख ले. उसमें खबरें कम चटपटी मसालेदार लटके झटके खुब दि खेंगे. एक पत्र में 25 खबरें हो तो कम से कम 40 विज्ञापन देखने को मिल जायेंगे. उनकी सफलता का मूल पाठकीयता कम दर्शनियता ज्‍यादा होती है. हिंदी पटटी में तो समाचार पत्रों को कबाडा ही बना दिया गया है. भाषा के नाम पर ऐसे प्रयोग किये जा रहे है कि किसी भी हिंदी प्रेमी के आंखो से बरबस आंसू निकल पडे. शिट,फन,फूड,फंडा को युवा के बीच लोकप्रिय मानकर खबरों के बीच उडेला जा रहा है.यहां पेज 3 पत्रकारिता भी स्‍वयं शरमा जाती है. यूथ व विमेंस के नाम पर प्रयोग इस तरह से किये जा रहे है कि भाषा विश्ेषज्ञ पानी भरने लगे.धार्मिक, सामाजिक व सांस्‍क़तिक रुपों को दर्शाने के चक्‍कर मे भाई बहन के रिश्‍ते हो या सास बहु के रिश्‍ते सब के बीच मीडिया पहुंच कर अपनी दखल बनाने में लगा है. संपादक की दखल मीडिया में नाम भर को रह गयी है.कई नामचीन अखबार तो अब बस मैनेजरों के सहारे ही अखबार को खींचने में अकलमंदी समझते है. पत्रकारिता मनोरंजन उद्योग का हिस्‍सा बन गयी है. मीडिया संचालको को पता तक नही कि पाठक जो चाहते है, वह उन्‍हें मिल भी रहा है या नही. उनके लिए विज्ञापन प्रदान करने वाली पठनीय या देखने की सामग्री उससे ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण होती है. स्‍वतंत्रता के समय स‍मर्पित पत्रकारों की जो त्‍याग व सेवा भावना थी, वह स्‍वतंत्रता प्राइज़ के कुछ दिनों बाद तक बनी रही लेकिन 80 के दशक के बाद यह लुप्‍त प्राय हो चुकी है. मिडिया के सभी बडे दिग्‍गज इससे वाकिफ है लेकिन बाजारवाद के आगे सब के सब नतमस्‍तक हो चुके है. पत्रकारिता के प्रशिक्षण के दौरान भले ही सिद्वांत कितनी पढा दी जाये, व्‍यवहार में आने पर सब कुछ बदल जाता है. प्रशिक्षितों की टीम प्रशिक्षण के नाम पर ब्रांड के लिए पेशेवर तेवर बनाने व किसी को नुकसान न हो ऐसी खबरें गढने के लिए प्रेरित करती है. मीडिया हमेशा सत्‍ता की धूर विरोधी रही है चाहे वह जैसे भी हो. क्‍योकि सत्‍ता हमेशा अपने हिसाब से काम करती है, जनता उसके बीच से हासिये पर ढकेले जाते है,ऐसे में पत्रकारिता ही उनकी भावनाओं की रक्षा करती है. यह सही है कि जनांदोलनों के अभाव से वर्तमान मीडिया भ्रमित हो चुकी है. स्‍वयं मिडियां के क्षेत्र में भी समान विचारों वाले लोगों को आंदोलन के रूप में सामने आकर भावी पीढी को मागदर्शन करने की जरूरत है.

Friday, October 24, 2008

ठाकरे की राजनीति व नपूंसकों की जमात

इन दिनो मीडिया व देश का बच्‍चा बच्‍चा राज ठाकरे नाम के शख्‍स की चर्चा में मसगूल है. गोया ऐसी बात नही कि वह गांधीजी का उत्‍तराधिकारी हो गया है,बल्कि उसने देश को अंधकार के गर्त में ले जाने का ऐसा घिनौना प्रयास किया है जिसकी जितनी निंदा की जाये कम है. यह शख्‍स जब कल तक अमिताभ परिवार को अपना टारगेज बनाये हुए था,तब लोग उसके वि षय में तरह तरह के अर्थशास्‍त्र की व्‍याख्‍या कर रहे थे, अमितजी ने उससे माफी मांगने में ही अपनी भलाई समझी, इसके पूर्व भी जब ठाकरे के गंूडों ने बिहारी छात्रों व उत्‍तर भारतीयों को टारगेट में लेकर हमला बोला तो महाराष्‍ट्र सरकार व केंद्र सरकार इसे अगंभीरता पूर्वक ले रही थी. लेकिन अब तो सर से पानी उपर हो गया है. इस देश में राजठाकरे जैसे राजनेताओं को पनपने देने वाले वही नपूसंक नेता है जो कभी अपराधियों व गूंडों को संसद तक पहुंचाने में स्‍वयं को गर्वान्वित महसूस करते रहे है. पैर के घाव को ठीक करने के बाद जरूरी है कि सर के धाव को भी ठीक किया जाये.

Friday, October 17, 2008

दौडती भागती जिंदगी में पीछे छूट रही संवेदनाएं

आज की दौडती भागती जिंदगी में हमारी संवेदनाएं पीछे छूट जा रही है. एक ओर जहां ग्‍लोबलाइजेशन के दौर में स‍बकुछ सिमटा प्रतीत हो रहा है तो वही, कई भावनाएं विरले ही देखने को मिलती है. सत्‍ता का गलियारा हो या विश्‍वविद्यालय का कैंपस, अस्‍पताल की सेवा भावना हो या नगर निगम की गतिविधियां हर ओर आप नजर दौडाएं कहीं कोई तारतम्‍यता दि खाई नही देती है. लगता है मानो सब अपने अपने काम निपटाये जाने में ही भरोसा करते है. छोडिये इनकों साहित्‍य, पत्रकारिता, कला व फिल्‍म की ओर भी देखे तो मानों कही कोई सामान्‍य द़ष्टि देखने को नही मिलती जहां आम आदमी अपने वजूद को तलाश सके. इसलिए अब वहां भी कोई सर्वमान्‍य लेखक,पत्रकार या सुपर स्‍टार देखने को मिलता. इन सब के बीच आप अपने राष्‍ट्रीय पहचान को देखे तो सब कुछ अलग थलग दि खता प्रतीत होता है. क्‍या इसे सिर्फ द़ष्टि भ्रम कहकर आगे बढ जा सकता है. यह ठीक है कि पूर्व की सामाजिक गतिविधियों से वर्तमान की सामाजिक गतिविधियों में स्‍पष्‍टता व खुलापन आया है, लोगों की देखने की द़ष्टि बदली है.

Tuesday, October 14, 2008

तोल मोल की बाते

कैसे भी कुछ भी विचार आ जाते हो विचार अभिव्यक्ति की खुली छुट ने हिंदी ब्लॉग की दुनिया में सब कुछ जल्दी से उगल देने बडा अवसर उपलब्ध करा दिया है. हिंदी समाचार पत्रों ने अपने सामने एक लक्छामन रेखा खीच रखी है इसलिए वहा एसा कुछ कर पाना मुश्किल है.वहा तो सड़क पर एक गुमनाम मुशाफिर की मौत होने पर सिंगल कालम तो किशी नामचीन की मौत हो ने पर डबल कालम की परिपाटी चलती है.किसी नामचीन नेता ने कुछ उगला तो उसे तिन कालम तक जगह दी जा सकती है . एक औरत की इज्जत सरेआम लुटती है तो फिर उसीतरह से भेदभाव किया जाता है जैसे की गैंग रेप के मामले अलग तरह से. खबरों को लिखते समय यह देखना ज्यादा जरुरी समझा जाता है की उसका पाठक वर्ग कितना है ,किन पाठको को कितना ग्राम समाचार चाहिए. जितना ही ज्यादा कुंठित पाठक वर्ग होता है उन्हें उनके लायक खबरे परोसी जाती है. मनोरंजन के नाम पर तो लुट की खुली छुट है, कुछ कुछ हमारे ब्लोगर बंधू भी ऐसा एसा ही प्रस्तुत कर रहे है.मस्तिस्क के विकारों को निपटने का ग़ालिब ये ख्याल अच्छा है.किसी भी समाचार या विचार को पढ़ कर आप को मति भरम की शिकायत हो जाये तो बिहार वालो के पास एक बड़ी ही बेशकीमती बुधिवर्धक चूर्ण मिलाती है उसकी इस्तेमाल करना न भूले.हिंदी के सु लेखको को तथा प्रकाशको को आलू प्याज की तरह अपने लिखे व् छापे गए सामग्री की कीमत वसूल किये जाने मात्र से मतलब है. व्यक्ति का चरित्र तो खो ही रहा है राष्ट्र का चरित्र भी धूमिल हो रहा है. समाजिकता समाप्त हो रही है व्यकितिवाद हावी हो रहा है.हमारी निजता ,मौलिकता,विचारो की सुदृढ़ता ख़तम हो रही है.जोजेफ मेजनी के शब्दों में शिछा, स्वदेशी तथा स्वराज्य राष्ट्रीयता के तीन प्रधान स्तम्भ है. पता नहीं की आज जो पढाई हमें लाखो रूपये की नौकरी उपलब्ध करदेती है वह एक अच्छा इन्सान क्यों नहीं बना पाती है . स्वदेश व राष्ट्र के प्रति प्रेरित क्यों नहीं कर पाती है.स्त्री पुरुष,जाती धर्मं से ऊपर उठाकर दिन दुखियों की सेवा के लिए आगे क्यों नहीं बढ़ पाती है. आज से सात दशक पूर्व गणेश शंकर विद्यार्थी जी ने प्रताप में लिखा था - आदर्शो पर मरना और उनके लिए जीना उन लोगो की दृष्टि में केवल मुर्खता है जिन्हें सुगमता प्रिय है और जो हाथ के पास का लाभ देख सकते है और जिनकी संख्या अब दिन दिन बढती जाती है. गौर से हम देखे तो आज भी गुलामी से बेहतर नहीं है खाने को हम स्वतंत्र है लेकिन मानसिकता अब भी गुलामो वाली ही है. २१ वी सदी में भी वही जिसे पिटे लकीरों को हम पिट रहे है जो कब का ख़त्म हो जाना चाहए था. हिंदी पत्रकारिता व लेखन में जो परिवर्तन दिख रहे है उससे क्या आप और हम संतुष्ट है - विचार किया जाना चाहिए.

Saturday, October 11, 2008

साहित्‍य लोगों के अं‍तर्मन से दूर हो रहा है

इन दिनों हिंदी साहित्‍य लेखन आम जनों के अ‍तर्मन से दूर होता जा रहा है. शायद हिंदी के लेखक व सुधी पाठकों के बीच मौजूद भ्रम को छोड दे तो ऐसा मालूम होता है कि साहित्‍य अब ज्‍यादातर स्‍व चिंतन व सुख के लिए लि खी जा रही है. अपने विचारों को थोपनें के चक्‍कर में कई बार अच्‍छे अच्‍छे लेखक भी भटकाव के शिकार हो रहे है. पिछले दिनों पटना में दिनकर जयंती के अवसर पर साहित्‍य अकादमी,नई दिल्‍ली द्वारा आयोजित कार्यक्रम में बरबस साहित्‍य के प्रति घटती रूचि को लेकर प्रख्‍यात साहित्‍यकार,आलोचक व कवि अशोक बाजपेयी को कहना पडा,ऐसी भीड बिहार में ही देखने को मिल सकती है, साहित्‍य के प्रति ऐसा लगावा हिंदी भाषी अन्‍य प्रदेशों यूपी,राजस्‍थान या मध्‍य प्रदेश में भी देखने को नही मिलती. जब उनसे मैने पूछा कि हिंदी कविता को गद्य बनाने के पीछे कौन सी विवेक बुद्वि है तो उन्‍होने कहा कि हिंदी गद्य व पद्य को करीब आना ही चाहिये. दूसरी ओर साहित्‍य अकादमी के वरीय पदाधिकारी ब्रिजेंद्र त्रिपाठी का कहना था कि अकादमी अपनी ओर से प्रयास कर रहा है कि हिंदी कविता में पुन लय व छंदों को प्रमुखता मिले. जब हिंदी वाले ही अपने आप में यह तय नही कर सकते कि कौन सी चीज पाठकों को रूचिकर लगेगी और कौन सी नही, अथवा कैसे लेखन को वरीयता दी जानी चाहिये तो फिर भला आम पाठक अपनी समस्‍या को कहा रखें. वैसे निश्चित है कि प्रत्‍येक पाठक अपने प्रिय रचनाकार को बार बार अवश्‍य ही पढना चाहेगा. कार्यक्रम के दौरान जब हिंदी कविता में नारी विमर्श जैसी चीजें शामिल हो रही है या नही यह पुछे जाने पर कवियत्री अनामिका ने कहा कि कविता चौराहे पर होने वाली बातचीत की तरह हो चुकी है.सब कुछ सुख व दुख बांटना चाह रही है. निश्चित तौर पर इसमें नारी विमर्श के पुट भी शामिल हो रहे है. खैर, इतना तो सत्‍य है कि आज जो भी महत्‍वपूर्ण पुस्‍तकें प्रकाशित हो रही खासकर, हिंदी भाषा में उनकी पांच सौ से तीन हजार प्रतियां ही प्रारंभ में छपती है,फिर उसके आठ दस पुनर्प्रकाशन के बाद उसकी सफलता का बखान किया जाता है. जबकि आज भी विदेशों में या अंग्रेजी भाषा के साहित्‍य की लाखों प्रतियां प्रकाशित होती है व प्रशंसित होती है. स्‍व भाषा या कहें राष्‍ट्रभाषा के संबंध में हमारी उदासीनता किस कदर है,इसकी परख करना मुश्किल है. आज से सात दशक पूर्व ही इस संबंध में गणेश शंकर विद्यार्थी जी ने अपनी चिंता जाहिर करते हुए प्रताप में लि खा था कि जब किसी साम्राज्‍यवादी शक्ति द्वारा दूसरे देश पर कब्‍जा करने की कवायद की जाती है तो सबसे पहले उसकी भाषा के पर कतर दिये जाते है. भाषा के बिना कोई राष्‍ट्र अपने संपूर्ण शक्ति का उपयोग नहीं कर सकता. आज भी हम भले ही हिंदी के विस्‍तार, वैश्विक होने, बाजारवाद के लिए आवश्‍यक समझे जाने अथवा अन्‍य कारणों को लेकर हिंदी भाषा का गुणगान कर ले,यह कहने में जरा भी अतिश्‍योक्ति नही बरते कि हिंदी विश्‍व की किसी भी अन्‍य भाषा के समक्ष खडी होने की ताकत रखती है किंतू यह सत्‍य है कि हिंदी के प्रति लगाव व भाषा की समझ हममें विकसित होनी अब भी शेष है.

Monday, October 6, 2008

हिंदी पत्रकारिता की दूर्दशा व दशा

मौजूदा समय में हिंदी पत्रकारिता की दूर्दशा से सभी लोग परिचित है चाहे वे पत्रकारिता जीवन में शामिल है या उसके सामान्‍य पाठक. यहां मैं सिर्फ इतना भर कहना चाहता हूं कि पत्रकारिता जीवन को लेकर आज से 77 वर्ष पूर्व 1930 इसवीं में दैनिक प्रताप के संपादक व हिंदी पत्रकारिता के युग पुरूष गणेश शंकर विद्यार्थी ने जाे भी आशंकाएं व संभावनाएं व्‍य‍क्‍त की थी उससे एक इंच भी आगे नही बढ पायी है. क्‍या गजब की सोच उन्‍होने व्‍यक्‍त की थी, पत्रकारिता जीवन का कैसा मापदंड तय किया था,सामाचार पत्रों के संचालन के संबंध में विचार व्‍यक्‍त किया था,आज भी कमोबेश वैसे ही हिंदी पत्रकारिता चल रही है. बलिदानी पत्रकार गणेश जी की मौत उस समय हुई थी जब वे कानपुर में फैले दंगे के बीच जाकर बीच बचाव का कार्य कर रहे थे. लोगों को आपस में कटने भीडने से रोक रहे थे. आज कैसे कोई पत्रकार उस स्थिति में जाना स्‍वीकार कर सकता है जबतक की उसमें उतना नैतिक बल नही हो. आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेद्वी, महामना मदनमोहन मालवीय जैसे संपादकों के साथ कार्य कर चुके गणेश जी ने तब कहा था कि अहिंसा हमारी नीति है धर्म नही. महात्‍मा गांधी के विचारों से प्रभावित उनके अनुयायी की द़ढ भावना ही थी कि उन्‍होने अपने प्रताप के माध्‍यम से भगत सिंह , विस्‍मल जैसे क्रांतिकारियों के विचारों को प्रमुखता दी,आज उनके विचार एक लेखक पत्रकार के रूप में हम देख परख सकते है. हद तो यह है कि गणेश जी एक ऐसे इंसान थ्‍ो जिन्‍होने अपने जीवन में पहली बार जेल यात्रा ब्रि‍टि श सरकार की खिलाफत के कारण नही बल्कि स्‍थानीय जमींदार के द्वारा किये जा रहे अत्‍याचार की आंखों देखी रिपोर्ट प्रताप में प्रकाशित किये जाने को लेकर करनी पडी थी.आज किसी संपादक की जेल यात्रा की इस प्रकार का कारण होना असंभव व नामुमकिन है. आज मशीनों के साथ पत्रकार व समाचार पत्रों को धन उगाहने का माध्‍यम बना दिया गया है. लोग बाग जीवन के साथ अपने कर्तव्‍यों को भी नही समझ पा रहे है.

Monday, September 15, 2008

नपुंसक नेतृत्व से हल नहीं हो सकता आतंकवाद

देश की राजधानी हो या कोई अन्य प्रान्त बेरोकटोक आतंकी घटनाये घट रही है.हमारा नेतृत्व नाकाबिल हो चूका है व राष्ट्र की मर्यादा के विरुद्ध आचरण कर रहा है. यह कौनसी सी मज़बूरी है की आतंकी घटना राष्ट्रीय राजधानी में घट जाती है और हमारे खुफिया तंत्र विफल साबित हो जाते है ,हमारे राजनेता वोटो की राजनीती में लगे रहते है . इस मसले पर शायद ही किसी विद्वान या संवेदनशील नागरिक ने अपने विचार व्यक्त नहीं किये हो.हमारे राजनेता किसी भी मसले को इतना खीचते है की वह बदबू देने लगता है.क्या भारत सरकार को पता नही की देश में किस तरफ से कितना घुसपैठ हो रहा है.पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अबुल कलाम का स्पस्ट मानना है-आतंक को रोकने के लिए केंद्र व राज्य का एकीकृत संयुक्त खुफिया तंत्र जरुरी है,साथ ही घुसपैठ रोकने के लिए एकीकृत सीमा सुरछा प्रबंधन की आवश्यकता है.सीमा पर आधुनिक सेंसर प्रणाली लगाना ,इन्फ्रा आधारित कैमरा लगाकर सखत नियंत्रण किया जाना चाहिए .उन्होंने सीमा सुरछा बल को सुझाव दिया है की इसरो द्वारा विकसित उपग्रह ,जो एक मीटर तक की छोटी जगह को भी देख सकता है उसे सीमा पर चौकसी में उपयोग करे.सवाल यहाँ यह है की एसा किये जाने से कौन अधिकारी या राजनेता रोकता है उसे चिन्हित किया जाना चाहिए.सर्वोच्च नयायालय की टिप्पणी है -लाखो लोगो का कोई जनसमूह जब किसी देश में अवैध रूप से प्रवेश कर जाता है तो यह एक प्रकार का आक्रमण है.इस आक्रमण से देश की सुरछा की जिमेदारी केंद्र सरकार की है . असम की ८२ लाख हेक्टेयर वन,भूमि,जनजातिय भूमि पर घुसपैठियों का कब्जा है.काजीरंगा नेशनल पार्क में हाथी और गैंडे की जगह बंगलादेशियों की झोपरिया दिखाई देती है.इस इलाके के छोटे बड़े व्यवसाय पर इनका दखल है.एक रिपोर्ट के अनुसार बांग्लादेश को प्रतिदिन २० हजार गाय तस्करी होती है.बांग्लादेश में लगे मलेशिया के कत्लगाह से १,८७,००० टन गौमांश का निर्यात होता है ,जिससे सालाना ३०० करोड़ की आय होती है.हथियार,जाली नोट मादक व नशीले पदार्थ,एक रुपया के सिक्के की खास कर,क्योंकि इससे दो ब्लेड बनती है जो पांच रूपये में बिकती है. क्या भारत सरकार को यह सब कुछ नहीं पता है,नहीं है तो किसकी जिम्मेवारी है पता करने की.पाकिस्तान को लेकर कई बार चिंताए व्यक्त की जा चुकी है, क्या हमारी आंतरिक सुरछा नीति,विदेश नीति की समीछा कर इसे धारदार बनाने की जरुरत नहीं समझ में आती है.कबतक हम अपने भाई बहनों का लहू बहता हुआ देखते रहेंगे.आतंकी घटना के बाद जब एक घंटे के अंदर कोई गृह मंत्री तीन बार कपडे बदलता हो,उसे बैठको में हालत की समीछा कर त्वरित निर्णय लेने की सूझ भला कैसे हो सकती है.सत्ताधारियों को खुफिया एजेंसियों को विरोधी दलों के पीछे लगाने की बजाये, राष्ट्र की सुरछा में लगाना होगा. अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब आम लोगो को ही नहीं बल्कि हर उस शक्श को अपने खून से स्वतंत्रता की कीमत चुकानी होगी.

Friday, September 12, 2008

हिंदी के प्रति दुराग्रह राष्ट्र का अपमान

पिछले दिनों मुंबई में जिस प्रकार से राज ठाकरे नामक तथाकथित राजनेता ने हिंदी बोले जाने को लेकर अमिताभ परिवार को अपमानित करने का प्रयाश किया वह निंदा योग्य है .हिंदी के ख्यात साहित्यकार के परिवार को जिस प्रकार से माफी मांगने को लेकर सार्वजनिक तौर पर बाध्य किया गया और अमितजी ने जिस उदारता से अपनी भावनाए प्रकट की ,यह हिंदी व हिंदुस्तान से सच्चा प्यार करने वाला ही एसा कर सकता है ,लुच्चो व लफंगों से निबटना भी हिंदी प्रेमी जानते है .हिंदी साहित्य के रचनाकारों को पूर्व में इससे भी ज्यादा प्रतारणा का शिकार होना पडा है लेकिन उन्होंने उफ तक नहीं की है .एसे लोगो के जिक्र से हिंदी साहित्य का इतिहास भरा पडा है .हिंदी सेवियों के परिवारवालों को कई जिल्लाते उठानी पड़ी है ,अपमान के घुट पीने पड़े है .वैसे भी कहा गया है की हिम्मते मरदा ,मददे खुदा .अमितजी के इस पुरे प्रकरण में जिस प्रकार की भूमिका निभाई है ,वे यहाँ भी बाजी मार गये है .लेकिन मेरी अपनी सोच है, प्रथमतः एसा अवसर प्रदान ही नहीं किया जाये ,न ही इसको लेकर कोई उतेजना पैदा की जाय ,लेकिन जब कोई गुंडा किसी भद्र व्यक्ति से उलझ ही जाने को तैयार हो तो उसे करारा जबाब दिया जाये ताकि भविष्य में फिर उसे एसा करने की हिम्मत ही न हो .पुरे प्रकरण पर हिंदी की रोटी खाने वालो का खामोस रह जाना बेहद दुखद है .हिंदी हमारी राष्ट्र भाषा है ,उसका अपमान अपने ही देश में हो ,और संबिधान के रखवाले चुप रहे ,यह नापंसुकता है .मुबई के पुलिस अधिकारी का यह कहना की मुबई किसी के बाप की नहीं है ,बिलकुल उचित है .क्या मराठी भाषी को उत्तर प्रदेश या बिहार में हिंदी नहीं बोले जाने को लेकर अपमानित या प्रतारित किया जाना उचित ठहराया जा सकता है .कश्मीर से कन्या कुमारी तक जो देश को एक नहीं समझता उन्हें यहाँ रहने का कोई अधिकार नहीं .

Saturday, September 6, 2008

बिहार में बाढ़

राष्ट्रीय आपदा की इस घडी में न जाने क्यों लोगो को जब भूमि विवाद चाहे वह सिंगुर का हो या अमरनाथ श्राइन बोर्ड का ,में उलझे देखता हु तो कुछ अजीब सा लगता है . क्या हम इतने संवेदना शून्य हो चुके है की जब देश में एक ओर लाखो की आबादी जीवन व् मृत्यु के दौर से जूझ रही है वैसे समय में हम अपने अपने स्वार्थ में लिप्त है .बिहार के बाढ़ प्रभावित जिलो में जाकर देखे कैसे हिन्दू मुसलमा एक साथ बैठ कर भोजन व् भजन कर रहे है .इस विपदा ने बड़बोले चेहरों को भी उजागर कर दिया है .खैरात में भीख दी जा सकती है ,लोगो की पीडा कम नहीं की जा सकती .बच्चे अनाथ हो चुके है ,कितनो का सिंदूर धुल गया है ,जीवन जीने का आधार छीन गया है यहाँ जो भी राहत सामग्री पहुच रही है उसे कोई सही तरीके से जरूरत मंदों तक पहुचाने वाला नहीं है .संकट के पल में हमने जीना सिखा है चाहे वह आतंकी घटनाये हो या प्राकृतिक आपदा लेकिन हमें धैर्य पूर्वक एक दुसरे का सहयोग तथा साथ देना भी सीखना होगा .कोसी की विनाशकारी लीला ने दो पीढियों बाद अपना रौद्र रूप दिखाया है .तब से अबतक नेपाल का रूप भी बदल चूका है .हमें अपने देश के नौनिहालों की चिंता करनी होगी अन्यथा याद रखे बड़े बड़े तानाशाहों व् हुक्मरानों को भी इतिहास भूलने में देर नहीं करता .जीवन की एक ही गति है सब को यहाँ सबकुछ छोड़ कर चले जाना है ,अपनी आदतों में सुधार नहीं लाये ,अपनी प्रवृत्यो को नहीं बदले तो इतना निश्चित मानिये की प्रकृति आपको स्वयम ही सुधार देगी .राष्ट्रीय संकट की इस घडी में संकट को वोट बैंक में बदलने अथवा इस में लूटपाट कर अपना घर भरने वालो सावधान हो जाये कही कोई है जो सबको देख रहा है . आइये , इस संकट को हम अवसर में बदल देने की कला सीखे .हम स्वयं में छिपी हुई मानवीय गुणों को विकसित करे .संकट की घडी में अफवाह फैलाने वालो से सावधान रहे .मीडिया भी खबरों की आपाधापी के बीच धैर्य बरते .जब चाहे बांध टूटने या फिर उसके नहीं टूटने की चर्चा न करे .डैमेज कंट्रोल के लिए जो भी बन पड़े किया जाना जरूरी है .राहत के पहुच रहे सामानों को सही हाथो तक पहुचाने में मदद करे .अफरातफरी की जो स्तिथि बनी हुई है उसे दूर करना होगा .आपदा के कारण उत्पन्न मनोवैज्ञानिक पहलू पर ध्यान देते हुए लोगो को उबरने में मदद करना होगा .
क्या कहे बाढ़ का जो सूरते हाल है वह बेहद पीडादायक है ,ज्यादातर समय अखबार के माध्यम से बाढ़ को लेकर सूचनाओ को इन दिनों बिहार सरकार व् आम जनता के बीच पहुचाने में बीत रहा है.सरकार तथा स्वयमसेवी संस्थाओ द्वारा राहत पहुचाने के प्रयास किये जा रहे है किन्तु सही व्यवस्था नहीं होने से अफरातफरी मची हुई है .बाते बहुत सी है .

Friday, August 29, 2008

भूख से बिलबिलाते बच्‍चे,उजडने व पुन बसने की नियति

उत्‍तर बिहार के कोशी अचंल में कोशी की धारा ने महाप्रलय मचा रखा है, नेपाल के कुसहा के समीप बांध टूटने के फलस्‍वरूप सहरसा जिला के पतरघाट,सौर बाजार एवं सोनबरसा प्रखंड में बाढ का पानी प्रवेश कर गया है, साथ ही सुपौल, मधेपुरा,पूर्णियां सहित छह जिलों के सैकडों गांव कोशी की धारा में विलीन हो गये. बच्‍चे भूख से बिलबिला रहे है, पिछले 10 दिनों से टीलों,भवनों, सार्वजनिक स्‍थानों पर शरण लिये हुए लोगों की सुधि लेने वाला कोई नही है. बडी ही ह़दयविदारक द़श्‍य है. सहरसा में सैकडों शरणार्थी पहुंच रहे है. कोशी कॉलोनी,सुपौल के रहने वाले संजीव कुमार बताते है कि सुपौल के ग्रामीण 100 रुपये किलो चुडा व दूध डेढ सौ रूपये लीटर खरीदने को बाध्‍य है,नमक 50 रुपये, अमूमन तीन रूपये में मिलने वाला बिस्‍कूट 20 से 50 रुपये किलो मिल रहा है. ऐसे समय में कालाबाजारियों की पौ बारह है. बांढ की विभीषिका से पत्‍नी व परिवार को निकाल कर किसी तरह सहरसा तक पहुंचे अमित कुमार बताते है कि मात्र 15 किलो मीटर की दूरी तय करने के लिए उन्‍हें साढे तीन हजार रूपये नाव वाले को देना पडा है. कहीं कही तो नाव वाले पांच हजार रुपये वसूल कर रहे है. मानव जीवन की इससे बडी त्रासदी क्‍या होगी जब लाखों लोग कोशी के प्रलय से जुझ रहे हो वैसे में कुछ टुच्‍चे लोग अपने स्‍वार्थ के कारण उसमें भी लाभ का योग ढूढ रहे है. मधेपुरा की सुनीता देवी इस लिए उदास है कि बांध व उंचे टीले के सहारे, नाव व पैदल वह परिवार को लेकर निकली किंतू उसके बढू ससूर छूट गये. कई परिवारों के आय का जरिया बने मूक जानवर बकरी, गाय,भैस को उन्‍हें मुक्‍त करना पडा ताकि वे अपना शरण ढूढे. बांध के टूटने, उसकी समय समय पर मरम्‍मति नही किये जाने के प्रति घोर लापरवाही बरतने के लिए राज्‍य सरकार को किसी भी तरह माफ नहीं किया जा सकता. कोशी ने पहली बार अपनी जलधारा नहीं बदली है, किंतू कोशी को पुन 1826 की स्थिति में ले जाने के लिए सूबे की अफसरशाही व राजनेता पूर्णतया दोष्‍ाी है. केंद्रीय सहायता, राजकीय सहायता, राष्‍ट्रीय आपदा घोषित किये जाने, राहत व मुआवजे का खेल बिहार में एक बार फिर शुरू हो गया है. गुरूवार को प्रधानमंत्री,यूपीए अध्‍यक्षा, कई केंद्रीय मंत्री, मुख्‍यमंत्री,बिहार सहित कई राजनेता पूर्णियां में उपस्थित थे. प्रधान मंत्री ने मुख्‍यमंत्री की मांग के अनुरूप एक हजार करोड रुपये राष्‍ट्रीय आपदा राहत कोष्‍ा से देने की घोषणा कर दी, चुनावी वर्ष में कोई भी राजनेता व दल बाढ को लेकर कुछ भी करने का मौका नहीं छोडना चाह रहे है. क्‍या इसके बावजूद इस समस्‍या के निदान के प्रति इनकी भावनाएं स्थिर है, क्‍या सचमुच बिहार को प्रत्‍येक वर्ष होने वाले बाढ की त्रासदी से मुक्ति मिल सकेगी, राहत व पुनर्वास के नाम पर राजनीति चमका कर सांसद व जनप्रतिनिधि बनने का मौका छोड विकास की ओर राजनेता सक्रिय हो सकेगा कई सारे प्रश्‍न अनुतरति है, कोशी क्षेत्र की जनता बार बार उजडने व बसने की नियति से निकल सकेगी यह कहना ब‍हुत ही मुश्किल है. वर्ष 93 में तत्‍कालीन मुख्‍य सचिव वीएस दूबे ने ऐसी परिस्थिति का पूर्व में आकलन करते हुए 18 दिनों तक कोशी के बांध पर कैम्‍प कर उसकी मरम्‍मति का कार्य किया था, रात 12 बजे उन्‍होने सिचाई मंत्री को सूचित किया था कि 'सर, वर्क इज ओवर, तब मंत्री ने मुख्‍यमंत्री लालू प्रसाद को उसी समय मुख्‍यमंत्री निवास में जाकर सूचित किया कि सर, उत्‍तर बिहार को बाढ की भयानक विपदा से बचा लिया गया. इस बार तो एनडीए के शासन काल में तो हद ही हो गयी, विकास व न्‍याय के शासन का राग अलापते नेता व नौकरशाह इस कदर निश्चित हो गये कि किसी को भी पिछले दो वर्षो से बांध की मरम्‍मति की नहीं सूझी. जब पानी का रिवाव शुरू हो गया तो बांध की मरम्‍मति को लेकर चहेते ठीकेदार की खोज शुरू हुई. तब तक तो बहुत देर हो चुकी थी. मात्र एक एज्‍यकुटिव इंजीनियर के सहारे पुरे क्षेत्र को भगवान भरोसे छोड दिया गया था. स्‍थानीय ग्रामीणों के भडकने को लेकर राज्‍य सरकार की यही बेत्‍लखी थी. बाढ के जाने माने वशिेषज्ञ टी प्रसाद कहते है कि अंग्रेजी शासनकाल होता तो शायद इतनी बडी समस्‍या नहीं होती,अंग्रेजी प्रारंभ से ही मूल समस्‍या का आकलन करते हुए चरणबद्व तरीके से काम कर रहे थे. बाद की सरकारों ने इस पर बहुत अधिक ध्‍यान नहीं दिया, अब भी समस्‍या को लेकर एक दूसरे पर दोषारोपण करने के सिवाय किसी के पास कोई अन्‍य विकल्‍प नहीं है. ऐसे ही परिस्थितियों में हिंदी साहित्‍य ने फणिश्‍वर नाथ रेणु, बाबा नागार्जुन जैसे साहित्‍यकारों को पैदा किया था, कोशी क्षेत्र के साहित्‍यकारो्ं के अतिरिक्‍त हवलदार त्रिपाठी सहदय ने तो बिहार की नदियों पर पुस्‍तक ही लि खी जिसकी उपादेयता आज भी बरकरार है. आज आवश्‍यकता है कि बडे पैमाने पर 25 लाख्‍ा से अधिक बाढ पीडितों के बीच बडे पैमाने पर राहत व पुनर्वास कार्य किये जाने की, क्षति का आकलन करते हुए मूल समस्‍या के निदान किये जाने की. मीडिया की जिम्‍मेवारी भी इस में बढ जाती है. 18 अगस्‍त को बाढ आया लेकिन राष्‍ट्रीय मीडिया ने उसे प्रारंभ में तवज्‍जों नहीं दिया, जब विनाश की भयंकरता का उसे अहसास हुआ तब जाकर कैमरे की फोकस उधर बढायी गयी, उधर से आ रही रिपोर्ट पर नजर जानी शुरू हुई, बात बात में हल्‍ला मचाने वाली मिडिया इसीप्रकार कारपोरेट घरानों के हाथों में खेलती रही तो इसमें कोई शक व सुबह नहीं कि इनकी लोकप्रियता सिर्फ बुद्वू बक्‍से तक ही सीमित हो कर न रह जाये, अथवा कागज काले करने के बावजूद उस कागज को रददी से ज्‍यादा महत्‍व नहीं मिले.

Friday, August 22, 2008

शुद्वतावादियों से कैसे बचे हिंदी

कल ही वरिष्‍ठ साहित्‍यकार व साहित्‍य आलोचक डा नामवर सिंह ने जेएनयू में दिये गये एक व्‍याख्‍यान में कहा कि हिंदी को सबसे अधिक शुद्वतावादियों से खतरा है. उनका मानना है कि भाषा का क्रमिक विकास जारी रहता है. हिंदी के मनीषी नामवर जी का पुरा व्‍याख्‍यान प्रिंट माध्‍यम से सामने नहीं आ पाया है,इसलिए कतिपय बातों पर स्‍पष्‍टीकरण प्राप्‍त करना अनिवार्य लगता है. शुद्वतावादियों को लोग पहले तो पुचकारते है फिर भाषा के विकास को लेकर, उन्‍हें अपने डंडे से हांकने का प्रयास किया जाता है.शुद्वतावादी का चोला पहनकर मठाधीशी करने के उपरांत लगता है कि कई लोग इससे उबने लगे है. हिंदी निसंदेह 60 वर्षो के बाद अपने मूल रुप से अलग दि खने लगी है, उसके तेवर व सौंदर्य का भी विकास क्रमिक रुप से हुआ है. वर्तमान पीढी तकनीक पर सवार होकर अपने भाषा को विकसित करने में लगी है. संभव है कि हिंदी भाषा में कई नए शब्‍द व उसके रुप बदल रहे है. लेकिन शुद्वतावाद से अलग होने पर व्‍याकरण के बंधन से भी मुक्‍त होने को साहित्‍य प्रेमी प्रेरित होंगे. भडास सहित कई ब्‍लॉगवार्ता पर इसके रुप भी देखने को मिल रहे है. फिर तो मुक्‍ता अवस्‍थ्‍ाा में क्‍या हिंदी जिन मूल्‍यों व विचारों को लेकर आगे बढ रही थी वह आगे कायम रह पायेगा. शुद्वतावाद से अलग होकर निसंदेह हिंदी का विकास होगा, लेकिन उसे नये रुप में आगे बढने का मार्ग भी प्रशस्‍त करना होगा. हिंदी के विकास में साहित्‍यकारों के साथ 20सदी के पूर्वाद्व में नए नए पत्रों के द्वारा पत्रकारों के द्वारा भी भाषा के रुप गढे जा रहे थे. विदेशों से आने वाली खबरों को जनता तक पहुंचाने के लिए अंग्रेजी भाषा के सटीक हिंदी रुपांतरण के लिए वे अथक प्रयास कर रहे थे. इनमें कई अनाम साहित्‍यकार पत्रकार थे,जिन्‍हें हिंदी के वर्तमान आलोचकों द्वारा लगभग विस्‍म़त सा कर दिया गया है. हिंदी अपने जन्‍म काल से ही शुद्व रुप से अपने स्‍व को विकसित करने के क्रम में विभिनन देशी विदेशी भाषाओं को समाहित करती रही है. दूनिया की अन्‍य भाषाओं के साथ भी ऐसा ही हुआ है. जापान में मेइजी ने समाज सुधार के लिए चयनित नवयुवकों को अमेरिका भेज कर उनकी भाषा व तकनीक के ज्ञान प्राप्‍त करने को प्रेरित किया था. उसका फलाफल हम आज देख सकते है. भारत में मैकाले ने भले ही गुलामी को पुख्‍ता करने के लिए अपनी शिक्षा नीति नि र्धारित की थी लेकिन उस शिक्षा नीति ने हिंदी व हिंदूस्‍तान के विकास में दूसरे रूप से सहयोग किया. हर किसी चीज के सकारात्‍मक पहलू को भी स्‍वीकारना चाहिये. शुद्वतावादियों से हिंदी को बचाने के नाम पर हिंदी का अहित न हो जाये, उसका रुप विक़त न हो जाये इसका भी ध्‍यान रखना होगा. जीवंत भाषा व समाज बदलते रहते है, हिंदी बदली है, हिंदूस्‍तान बदला है, परिवर्तन संसार का नियम है. हिंदी नहीं बदली तो उसका भी हाल संस्‍क़त की तरह हो जायेगा. हिंदू शब्‍द की तरह हिंदी भी भारत में नहीं बना, ईरान से आया है ऐसे ही कई नए शब्‍द आयेंगे,जुडेंगे.
उसकी निजता बरकरार है व रहेगी, इस निजता के साथ छेडछाड संभव नहीं है. बाकि वाहय आवरण तो सदा बदलते रहेंगे.

Saturday, August 16, 2008

स्‍व तंत्र और स्‍वतंत्रता को कैसे समझे नवयुवक

मौजूदा संदर्भ में स्‍व तंत्र, स्‍वयं विकसित किये गये तंत्र और वास्‍तविक स्‍वतंत्रता का मतलब आज के युवा कैसे समझे. हद हो गयी शुक्रवार को, बीते 15 अगस्‍‍त के दिन. राजधानी पटना से 60 किलोमीटर की दूरी तय करने के दौरान न तो राजधानी में न तो रास्‍ते में और न ही 60 किलोमीटर दूर स्थित शहर में कहीं भी लाउडस्‍पीकर पर किसी कोने से देशभक्ति गीतों के स्‍वर सुनाई दिये. अपनी स्‍वतंत्रता के इस गौरवपूर्ण दिन को लेकर, राष्‍ट्रीय स्‍वाभिमान को लेकर ऐसी खोमीशी इससे पूर्व मैने अपने छोटे से जीवन में कभी नही देखी. इसलिए इस बात को आमलोगों के बीच पहुंचाने के लिए बाध्‍य हो गया. हमने जो अपने तंत्र विकसित कर लिये है उसमें कही से भी स्‍वतंत्रता का कोई मतलब नहीं रह गया है. भारतीय चिंतन पद्वति के अनुसार वैसे भी इस धरा पर कोई भी पूर्णतया स्‍वतंत्र नहीं है, सब ईश्‍वर, एक दिव्‍यशक्ति के नियंत्रणाधीन है.अगर बात ऐसी है तो कोई बात नहीं है.

Wednesday, August 13, 2008

1857 के प्रथम स्‍वतंत्रता संग्राम का जश्‍न

आज हम सभी 1857 की क्रांति अथवा प्रथम स्‍वतंत्रता संग्राम के 150 वें वर्ष का जश्‍न मना रहे है. कैसा दुर्भाग्‍य है इस देश का जब हम अपने जश्‍न के दौरान मौजूदा हालात पर जरा भी गंभीर नहीं है. सभी राज्‍य सरकारें इस जश्‍न को मनाने के लिए लाखों रुपये खर्च कर रही है. लेकिन कहीं से भी मूल्‍क के आंतरिक हालात, पडोसी देशों के साथ हमारे बिगडते संबंध, वैश्विक नीति, बाजारबाद इत्‍यादि के मूल्‍यांकन की तैयारी नहीं दि खाई पड रही है. 1857 का सशस्‍त्र विद्रोह, आधुनिक भारत के इतिहास का एक माइल स्‍टोन है. इस विद्रोह के फलस्‍वरूप जहां एक ओर भारत में ईस्‍ट इंडिया कंपनी का अस्तित्‍व समाप्‍त हो गया और सीधा ब्रिट‍ि श शासन शुरु हुआ, वही दूसरी ओर भारत पर ब्रिटि श शासन के संबंध में भारतीयों व अंग्रेजों का नजरिया भी पुरी तरह बदल गया. वर्तमान परिप्रेक्ष्‍य में क्‍या प्रथम स्‍वतंत्रता संग्राम को याद करते हुए हमारे जेहन में कहीं से भी यह बात आती है कि पिछले 150 वर्षो के बाद भी मूल्‍क में भ्रष्‍टाचार,भाई भतीजावाद, चरमपंथ, राजनैतिक पतन जैसे असाध्‍य रोगों से हम मुक्‍त हो पाये है. पूंजीवादी व्‍यवस्‍था के तहत पोषित होने वाली बडी बडी कंपनियों के साथ कदम ताल मिलाते मिलाते हम क्‍या से क्‍या कर बैठे है. जीवन का सुकून व चैन छिन सा गया है.
पूंजीपतियों के सहारे भारतीय राजनीति को सीचिंत करने की शुरूआत बीसवी सदी के प्रारंभ से ही शुरू हो गया था. तब के कई वरिष्‍ठ साहित्‍यकार व पत्रकार इस स्थिति को भली भांति समझ रहे थे. वे स्‍पष्‍ट तौर पर देख रहे थे कि नेशनल एसेबली व प्रिवी कौसिंल की सदस्‍यता को लेकर कैसे पुराने व नये राजनीतिज्ञों में होड मची है. पत्रकारिता भी इससे अछूति नहीं रही थी. लोकमान्‍य तिलक की प्रशंसा करते नहीं थकने वाले तत्‍कालीन दक्षि ण भारत के एक पत्र के संपादक कैसे बाद में 3500 रुपये संगठन के फंड का गबन करने का आरोप लगाते हुए बाद में तिलक के विरोध में खडे हो गये थे. उत्‍तर भारत व पं बंगाल से निकलने वाले कई पत्र लगातार स्थिति का मुआयना कर रहे थे. इसमें कई जागरूक पत्रकार दंगे का विरोध करते हुए बीच सडक पर मारे गये, वही कईयों पर जातीय व देश सेवा के स्‍थान पर सांप्रदायिकता का लेबल चस्‍पा कर दिया गया. उन्‍हें देश ने बाद में याद करना भी मुनासिब नहीं समझा. हमें रूक कर फिर एक बार सोचना चाहिये.

Monday, August 11, 2008

हिंदूस्‍तान के नौजवान खिलाडी को सैल्‍यूट

अभिनव बिंद्रा ने ओलंपिक खेल में स्‍वर्णपदक प्राप्‍त कर 28 साल बाद भारत माता की झोली में लाल ओ जवाहर लाकर रख दिया है.

व्‍याकरण की भूलें व हास्‍य परिहास

कभी कभी व्‍याकरण की छोटी छोटी भूले हिंदी लेखन को हास्‍यास्‍पद बना देती है. माना कि कंप्‍यूटर के की बोर्ड पर कई बार उगंलियां अक्षरों को चिन्हित करने में भूलें कर बैठती है. कुछ अज्ञानतावश तो कुछ कंप्‍यूटर के की बोर्ड की विस्‍त़त जानकारी के अभाववश. अधिकांश ब्‍लॉगर चाहते हुए भी हिंदी की वर्तनी की भूलों से बच नहीं पाते. फिर भी हमारा प्रयास व्‍याकरण के अनुशासन में रहकर लेखन को विकसित करना होना चाहिये. संभव है इसमें कई त्रुटियां हो, लेकिन उसे समझने का भी प्रयास करना होगा. उदाहरण के लिए सिर्फ पूर्णविराम की गलतियों से कैसी हास्‍यास्‍पद स्थिति पैदा हो सकती है इसकी बानगी पर जरा गौर करें.

एक गांव में एक स्त्री थी । उसके पति यूनिक कंप्‍यूटर सेंटर मे कार्यरत थे । वह आपने पति को पत्र लिखना चाहती थी पर अल्पशिक्षित होने के कारण उसे यह पता नहीं था कि पूर्णविराम कहां लगेगा । इसीलिये उसका जहां मन करता था वहीं पूर्णविराम लगा देती थी ।उसने चिट्टी इस प्रकार लिखी--------मेरे प्यारे जीवनसाथी मेरा प्रणाम आपके चरणो मे । आप ने अभी तक चिट्टी नहीं लिखी मेरी सहेली कॊ । नौकरी मिल गयी है हमारी गाय को । बछडा दिया है दादाजी ने । शराब की लत लगा ली है मैने । तुमको बहुत खत लिखे पर तुम नहीं आये कुत्ते के बच्चे । भेडीया खा गया दो महीने का राशन । छुट्टी पर आते समय ले आना एक खुबसुरत औरत । मेरी सहेली बन गई है । और इस समय टीवी पर गाना गा रही है हमारी बकरी । बेच दी गयी है तुम्हारी मां । तुमको बहुत याद कर रही है एक पडोसन । हमें बहुत तंग करती है तुम्हारी बहन । सिर दर्द मे लेटी है तुम्हरी पत्नी .

Friday, August 8, 2008

रामसेतू विवाद और कंब रामायण

राम सेतू विवाद के निपटारे के लिए हाल ही में केंद्र सरकार को अचानक साहित्‍य की शरण में जाना पडा. सुप्रीम कोर्ट में तमिल में मूल रूप से लि खे गये कंब रामायाण को उद्वत किया गया. इसी कंब रामायण का हिंदी अनुवाद बिहार राष्‍ट्रभाषा परि षद द्वारा दो खंडों में प्रकाशित किया गया है. इसका अनुवाद एनवी राजगोपालन ने किया है. साहित्‍य सदा से ही समाज व राष्‍ट्र का पथ प्रदर्शक रहा है. हमारे कई साहित्‍यमनीषीयों ने अपने अनुभव व ज्ञान से कई ऐसी प्रेरक रचनाएं प्रस्‍तुत की है जिनका अध्‍ययन व अवलोकन हमें सत्‍य के मार्ग पर आगे बढने में सहायता पहुंचाता है. महापंडित राहुल सांस्‍क़त्‍यान ने तिब्‍बत व हिमालय की पहाडियों में घूम घूम कर विपूल साहित्‍य एकत्रित किया, वह भी पटना म्‍यूजियम में सुरक्षित है. उनके द्वारा रचित मध्‍य एशिया का इतिहास का भी प्रकाशन बिहार राष्‍ट्रभाषा परि षद द्वारा किया गया है. 1956 में इस पुस्‍तक को साहित्‍य अकादमी पुरस्‍कार भी मिला है. आज इतने महत्‍वपूर्ण ग्रंथों के प्रकाशन करने वाले संस्‍थान की हालात कैसी है, इसे देखकर हिंदीसेवी व प्रेमियों की आंख भर आ सकती है.नौकरशाही व राजनीति की छाया से यह अबतक मुक्‍त नहीं हो पायी है. तीन वर्षो से इस संस्‍थान द्वारा पुरस्‍कार वितरण साहित्‍यकारों के बीच नहीं किया गया है. साथ ही, इसके ज्‍यादातर पुरस्‍कार हमेशा विवादों के केंद्र में रहे है. मानव संसाधन विकास व‍ि भाग बिहार सरकार को इसकी कोई चिंता नहीं. इस संस्‍थान को महापंडित गोपीनाथ कविराज जी की कई क़तियों के प्रकाशन का गौरव भी हासिल है. आज जो हिंदी हम प्रयोग में लाते है उसमें प्रस्‍तुत प्रथम गद्य रचना पं सदल मिश्र द्वारा रचित नासिकेतोपाख्‍यान के प्रकाशन का भी गौरव इस संस्‍थान को है. इस रचना की मूल प्रति आज भी इंपीरियल लाइब्रेरी लंदन में अंग्रेजों द्वारा सुरक्षित रखी गयी है. प्रसिद्व आलोचक आचार्य रामचंद्र शुक्‍ल ने भी इसे आधुनिक हिंदी के करीब होने वाली पहली रचना माना है. जब विकास प्रिय सरकारों का ध्‍यान अपने समाज के साहित्‍य संस्‍क़ति की सुरक्षा की ओर नहीं जाता है तो यह जिम्‍मेवारी समाज को स्‍वयं आगे बढकर उठानी चाहिये. आखिर कब तक सरकार को दोष देकर हम बचने का प्रयास करते रहेंगे. साहित्‍य के पहरूओं को अपने अपने प्रदेशों के हिंदी सेवी संस्‍थानों की भी खोज खबर लेनी चाहिये.

08/08/08 का चक्‍कर व मीडिया

हद हो गयी, अब बस भी करो, ये क्‍या है आम आदमी के बीच ज्ञान बांटा जा रहा है या हमारे मनीषियों, साधकों द्वारा वर्षो साधना कर प्राप्‍त किये गये ज्‍योति षय ज्ञान का बंटाधार किया जा रहा है. शाम होते ही हमारे घूमंतु मित्रों ने जाने कहां कहां से चक्रवर्ती ज्ञानियों को पकडकर ले आये, और शुरू होगयी बहस 08/08/08 के समान अंकों के कारण ये होगा, आप ये न करे, आप वो न करे, मानो कयामत टूट पडने वाली हो. ज्ञान को भय का साधन न बनाओं, अब बस भी करो. माना कि भारत भूमि ज्ञानियों से अटी पडी है, ज्‍यादातर लोग पढे से ज्‍यादा सुने पर विश्‍वास करते है, जब आप ब्राह़ांड की घूमती तस्‍वीर के साथ अनर्गल बातें बतायेंगे तो लोगों का दिमाग चक्‍कर में पडेगा ही. ऐसी बात नही कि ये सभी ज्ञान व जानकारियां सिर्फ विद्वतजनों के लिए ही सुरक्षित रहनी चाहिये, हम तो कहते है इसे सब को जानना चाहिये, किंतू क्‍या इस तरह से भय व मानसिक विक़तियों को परोश कर. बहुत अच्‍छा लगा जब किसी ने देश के प्रसिद्व ज्‍योि‍तषविद बेजान दारूवाला से चंद मिनटों की बातें लगे हाथ कर ली. उन्‍होने बिल्‍कुल स्‍पष्‍ट कहा कि बेखौफ होकर,ईमानदारी पूर्वक अपना कार्य करें,घबराने की कोई जरूरत नहीं है. उन्‍होने कहा कि इस अंक के कमाल से भयभीत होने की कोई जरूरत नहीं है, भय हो तो मात्र दस फीसदी. किसी बात को बिना समय गवायें लपक लेने वाली मीडिया बस यही आकर गच्‍चा खा जाती है, किसी व्‍यक्ति के जीवन में जितनी महता प्रेम की है, उतनी ही भय की भी. नमक का प्रयोग तो खाने में अवश्‍य होता है किंतू ज्‍यादा नमक युक्‍त भोज्‍य पदार्थ किस प्रकार उच्‍च रक्‍तचाप को नि‍मंत्रण देता है इसका भी ख्‍याल रखना चाहिये. देश के सभी विजुअल चैनल जब एक साथ एक वि षय पर लगातार हाय तौबा करने लगे तो अचानक यह बात समझ से परे हो जाती है कि आखिर इस वि शेष ज्ञान का क्‍या मतलब है. देश में कई समस्‍याएं है. जम्‍मू कश्‍मीर भूमि के मामले को लेकर जल रहा है, विभिन्‍न प्रदेशों में आतंकी घटनाएं बढ गयी है. राजनीतिक दल अपने अपने स्‍वार्थो में लिप्‍त है. मंहगाई की मार से आम आदमी की कमर टूट रही है. पडोसी हमारी गतिविधियों पर नजर गडाए बैठा है, हम है कि इनसे दूर ग्रहों के मिलने व उसके पर‍ि णाम को लेकर चितिंत है. इस चिंता को दूर करने के साधन होने चाहिये किंतू इसका खुलासा ऐसे तो न हो कि आम आदमी भय के मारे अधमरा हो जाये.

Friday, August 1, 2008

मीडिया में आज भी हासिए पर है साहित्‍यकार

प्रिंट व इलेक्‍ट्रानिक मीडिया में समान रुप से साहित्‍य व साहित्‍यकार हासिए पर ढकेले जा रहे है. प्रिंट मीडिया तो थोडी बहुत इज्‍जत बचाने के लिए साहित्‍यकारों की पुण्‍यतिथि व जन्‍मतिथि को स्‍थान भी उपलब्‍ध करा देता है किंतू इलेक्‍ट्रानिक मीडिया तो इससे परहेज करने में ही अपनी चतुराई समझता है. 31 जुलाई को ख्‍यात साहित्‍यकार प्रेमचंद की जंयती थी, साथ ही उसी दिन गायकी के बेताज बादशाह मो रफी पुण्‍यतिथि भी. प्रिंट मीडिया ने तो थोडा बहुत स्‍थान दोनो महानायकों को दिया किंतू इलेक्‍ट्रानिक मीडिया यहां भी डंडी मार जाने में भलाई समझी. क्‍योकि मो रफी को याद करने के बहाने गीत व संगीत के रुप में दर्शकों को मनोरंजन परोसा जा सकता है किंतू प्रेमचंद इसके लिए बिल्‍कुल ही अनुपयुक्‍त साबित होते है. वैसे भी प्रेमचंद पर मीडिया कवरेज के लिए भारी मशक्‍त करने की जरूरत हो सकती है. हद तो यह है कि हिंदी पत्रकारिता व हिंदी में महत्‍वपूर्ण योगदान देने वाले व्‍यक्तित्‍व चाहे वह प्रेमचंद हो, प्रताप के संपादक रहे बलिदानी पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी हो, या अंग्रेजी हुकूमत से जुझने वाले माखनलाल चतुर्वेदी, पं ईश्‍वरी प्रसाद शर्मा इन्‍हें याद करने की फुसर्त किसे है. संयोगवश पं ईश्‍वरी प्रसाद शर्मा की 81 वीं पुण्‍यतिथि 23 जुलाई को थी. उनके बारे में तो नयी साहित्यिक पीढी को शायद बहुत कुछ मालूम भी नहीं है. साहित्य सेवियों की नयी पौध को शोध व अपने पुर्वजों के बारें में जानने की फुर्सत भी नहीं है. साहित्यसेवियों को मीडिया द्वारा व्‍यापक फलक तब प्रदान किया जाता है जब उन्‍हें बुकर पुरस्‍कार या अन्‍य उल्‍‍लेखनीय पुरस्‍कार प्रदान किये जाते है. जैसे ये पुरस्‍कार इस बात के मानक बन चुके है कि उन्‍हें चर्चा के लिए कितना स्‍थान दिया जाना है. मो रफी को तवज्‍जों दिये जाने से मेरी कतई मंशा नहीं है कि उनका सामाजिक अवदान कम है या उन्‍हें कमतर स्‍थान मिलनी चाहिये. साहित्‍यकार अपने समय व समाज का प्रतिनिधि होता है. उसे भूलकर हम सिर्फ मनोरंजन के द्वारा अपने समाज को किस मार्ग पर ले जाना चाहते है यह तय करने की जरूरत है. द़श्‍य व श्रव्‍य माध्यम से आज की युवा पीढी ज्‍यादा प्रभावित हो रही है. पढने की आदत छूटती जा रही है. इस आदत के कारण मीडिया में वह मांग नहीं पैदा हो पा रही है, जिस कारण पुस्‍तकों की महत्‍ता पुर्नस्‍थापित हो सके. यह अलग बात है कि इतने सारे अवरोधों के बावजूद हिंदूस्‍तान के किसी भी शहर में पुस्‍तक मेलों का आयोजन हो, भीड खींची चली आती है. यह स्‍वत र्स्‍फूत भीड होती है. यहां कोई ग्‍लैमर नहीं होता. भीड में वेद, भाष्‍य के साथ ओशों के भी पाठक होते है, वही ज्ञान विज्ञान, साहित्‍य, पाक कला, मनोरंजक पुस्‍तकों के रसिक भी होते है. इन्‍हें मीडिया की चमक दमक की जरूरत
नहीं पडती.

Saturday, July 26, 2008

रो रही वैशाली.....

वैशाली जार जार रो रही है. उसका रोना न तो किसी की समझ में आ रहा है न वह किसी को कुछ स्‍वयं समझाना चाहती है.उसकी पीडा बहुत ही विकट है. उसे न किसी के प्रति क्रोध है न किसी से अब उम्‍मीद ही बची है. कदाचित, घोर निराशा की घडी उसके जीवन में इतनी पूर्व में कभी नही हुई थी. उसने राजतंत्र को धीरे धीरे समाप्‍त होते देखा था, मगध साम्राज्‍य के उदभव व विकास के साथ उसे नेस्‍तानबुद होते भी देखा. मध्‍यकाल, मुगलकाल फिर उसके बाद आयी अंग्रेजों की गुलामी का दौर जब वैशाली घोर निराशा के दौर से गुजर रही थी. वैशाली की पीडा सिर्फ गुलामी की पीडा नहीं थी, उसे अपनो द्वारा जमींदारो, सामंतों द्वारा चलाये जा रहे समांतर व्‍यवस्‍था की पीडा भी कष्‍ट पहुंचा रही थी. उसे अपने संतानों पर भरोसा था. उसे मालूम था कि एक दिन ऐसा आयेगा,जब फिजां में गणतंत्र का परचम फिर लहरायेगा. गणतंत्र जिसमें न कोई छोटा होगा न बडा, न कोई शासक होगा न शासित, न कोई शोषक होगा न कोई शोषण पीडित. उसकी ऐसी मान्‍यता इस लिए थी कि संपूर्ण भू मंडल पर पहली बार गणतंत्र का विकास उसी के आंचल की छांव में हुआ था. आज वह जार जार रोने को मजबुर है. उसे अपनी संतानों पर से विश्‍वास उठ चुका है. उसे पता नहीं कि फिर कब गणतंत्र अपने मूल रूप में सामने आयेगा. ऐसा चारो ओर अंधेरा दीख रहा है. जिस राष्‍ट्र को गणतंत्र की शुरूआत करने का गर्व था, आज उसी राष्‍ट्र की सर्वोच्‍च लोकतांत्रिक इकाई संसद में मां भारती के बेटों ने, वैशाली के बेटों ने उसे लज्जित कर दिया है. सब एक दूसरे पर लांक्षन लगा रहे है. यह वक्‍त विश्‍लेषण करने का नहीं कि किसने क्‍या किया, यह सोचने का है कि आगे हम क्‍या करें कि पुन ऐसा दिन देखने को नहीं मिले. हमारे गणतंत्र को दागदार बनाने वाले धोखेबाज,गददार व राष्‍ट्रद्रोही तत्‍व नकाब ओढकर जनता को धोखा न दे सके,ऐसा क्‍या करें. वैशाली के वंशज, भरत के वंशज जो शेरों के दांत गिना करते थे, अपने प्राणों की आहुति देकर भी अपनी मात़भूमि की लाज बचाते थे, आज उन्‍हें क्‍या हो गया है. 'जननी जन्‍मभूमिश्‍च स्‍वर्गादपि गरियसी, का उदघोष करने वाले आर्यावर्त की भूमि को नपूंसकों ने ऐसी स्थिति में ला दिया है जहां राष्‍ट्रभक्‍तों की हुतात्‍माएं चित्‍कार कर रही है. यह गजब का संयोग है कि भारतीय युद्व इतिहास के महानायक जनरल मानिक शॉ ने इस घटना के पूर्व अपनी आंखे बंद कर ली, सोचिए उनपर क्‍या गुजरती जब वे ऐसा करते अपने जनप्रतिनिधियों को देखते. मानव तस्‍करी, मानव की खरीद फरोख्‍त को मानवाधिकार का हनन बताने वाले जब जनप्रतिनिधियों की खरीद फरोख्‍त में जुट जाये तो स्थिति सोचनीय हो जाती है. धन्‍य है ऐसे राजनेता जिन्‍हें वैशाली के आंसू नहीं बल्‍कि सत्‍ता की कुर्सी द‍ि खाई पडती है.

Monday, July 21, 2008

गण वि‍हीन तंत्र

आज पुरे देश में तंत्र की ही चलती है. तंत्र का जीवन के प्रत्‍येक पहलू पर अधिकार है. यह अधिकार भी अनजाने में उसे नहीं मिला है, भारतीय संव‍ि धान ने उसे प्रदान किया है. तंत्र अपनी मस्‍त चाल से काम करता है,गण बेहाल रहे इससे उसे कोई मतलब नहीं. चाहे किसान आत्‍महत्‍याएं करे, रोटी के लिए जंग मची हो, गरीबी की रेखा दिनो दिन बढती जा रही हो, मंहगाई कमर तोडती रहे, तंत्र अपनी धुन में लगा रहता है. तंत्र द्वारा गण को शेयर मार्केट व सेंसेक्‍स की गिरती उतरती तस्‍वीर दि खाई जाती है, उसे बताया जाता है इंडिया शायनिंग. महानगरों की चकाचौंध, देश की बदलती तस्‍वीर, कैमरे की चमक के बीच आम नागरिक की देशभक्ति ताकि वह भ्रम में न रहे. रोम में ऐसा ही हो रहा था जब नीरो बांसुरी बजा रहा था और लोगो से पूछता था कि रोटी नहीं मिल रही है तो वे ब्रेड क्‍यो नहीं खाते. 15 अगस्‍त हो या 26 जनवरी राष्‍ट्रीय पर्व भी गण के लिए बेमतलब होते जा रहे है. हिंदी पत्रकारिता हो या क्रांतिवीरों की देशभक्ति आज उसके कोई मायने नहीं रह गये है. भारतीय संवि धान के निर्माताओं ने ऐसा सोचा भी नहीं होगा कि जिन गणो के लिए तंत्र का निर्माण कर रहे है वही एक दिन भस्‍मासुर की तरह गण को तबाह करने पर तुल जायेगा. आज महंगाई की मार बढती है तो वित्‍त मंत्री मुंबई की ओर भागते है. प्रधानमंत्री की कुर्सी पर खतरा मंडराने लगता है, केंद्र की सरकार गिरने की स्थिति में आ जाती है तो कारपोरेट घराने याद आने लगते है. एक एक जनप्रतिनिधि को रूपयों में तौला जाने लगता है, सजायाफता भी मेहमान नजर आने लगते है. क्‍या इन्‍हीं दिनों के लिए राष्‍ट्र निर्माताओं ने स्‍वयं की कुर्बानी दी थी. अपने वतन पर दिला जान नियोच्‍छावर कर दिया था. जिस बाजारवाद,उदारीकरण, ग्‍लोबलाइजेंशन के कारण शायनिंग इंडिया की तस्‍वीर बनाने को हम मजबूर हो गये है क्‍या उस पर नकेल कसना अब मुश्किल हो गया है. हमारे मस्तिष्‍क इतने कुंद हो गये है कि हमें राह नही सूझ रही है. गण को एक बार फिर ठहर कर सोंचना होगा. तंत्र के भुलावे में नहीं पडकर देखना होगा कि कैसे अपनी बाजुओं को मजबूत कर हम अपनी मात़भूमि को दलाल, मक्‍कार व फरेबी चेहरों से बचाकर रख सकते है. सरकारे आती जाती रहेंगी, राष्‍ट्र को बचाना होगा.हमें अपनी तकदीर स्‍वयं गढनी होगी. तंत्र को अपने अनुसार कार्य करने योग्‍य बनाना होगा.

Thursday, July 17, 2008

परमाणु करार पर राजनीतिज्ञों की रस्‍साकशी

अजब व गजब मूल्‍क है हिंदुस्‍तान. यह कब किस बात को लेकर राजनीतिज्ञों के विचार बदल जाते है,इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है. अब लीजिए, परमाणु करार को मुददा बनाकर, केंद्र की सरकार के माथे पर बल वामपंथियों ने डाल दिया है. भाई मेरे सत्‍ता के समर्थन व समर्थन वापसी से ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण है देश. भारत भूमि पर बिजली की उपलब्‍धता हो, चहुंओर जगमग रोशनी हो, लोगों के रोजी रोजगार में विद्यूत उर्जा का उपयोग हो, ये भला देश का कौन ऐसा नागरिक नहीं चाहेगा. हां,इसको लेकर राजनीति की दूकान चमकानी हो, तो भला और बात है. वामपंथियों को यह कहना बिल्‍कुल ही जायज है कि आखिर इस करार के प्रति देश की प्रतिष्‍ठा को कहीं पश्चिम के हाथों गिरवी तो नहीं रखी जा रही है. इसे