Friday, June 13, 2008

पत्रकारों पर हो रहे हमले,दोषी कौन

आज पत्रकारों पर दिनों दिन हमले बढते जा रहे है, इसके लिए मूल रूप से किसी को दोषी ठहराये जाने से अच्‍छा है कि इस पुरे मुददे पर विस्‍त़ार से बात चीत की जाए
' कई बार हमें लगता है कि समाज में घटती सहनशीलता के कारण ऐसा हो रहा है लेकिन इससे भी इतर कई कारण हो सकते है.' भूमंडलीकरण व बढती व्‍यावसायिक प्रतिस्‍पर्द्वा ने मीडिया व आम जनता को एक दूसरे का पुरक न बनाकर विरोधी बना दिया है' मीडिया का सामान्‍य जीवन में हस्‍तक्षेप बढा है, वही जनता अब सब कुछ जानने व समझने के लिए मांग करने लगी है'. सूचना क्रांति के युग में सूचना की मांग हर ओर से हो रही है'वही दूसरी ओर चाहे हम माने या ना माने ऐसा है कि पत्रकारिता के समक्ष मूल्‍यविहीनता का संकट खडा हो गया है. समाज का हर तबका चाहे व्‍यवसायी हो या राजनेता, नौकरशाह हो या पुलिस सब ये मान कर कार्य कर रही है कि उनके बिना समाज की कल्‍पना नहीं की जा सकती तथा उनकी उपयोगिता इस लिए है कि शेष सभी उनकी हां में हां मिलाये. हाल के दिनों में चाहे व अफगानिस्‍तान में बीबीसी संवाददाता के उपर किये गये हमले की घटना हो या बिहार की राजधानी पटना के ख्‍यात पटना मेडिकल कॉलेज अस्‍पताल में पत्रकारों को खदेड कर डाक्‍टरों द्वारा पीटे जाने की घटना सब यही बयां कर रही है कि कोई आज अपनी स्थिति से थोडी बहुत भी पीछे नहीं हटना चाहता. अमेरिका तानशाही करे, या तालिबानी अत्‍याचार, डाक्‍टर इलाज व जनसेवा की शपथ लेकर पिस्‍तौल गोली चलाने लगे उन्‍हे लगता है कि वे ही अपनी जगह सही है बाकि का पुरा मीडिया जगत अंधेरे में जी रहा है. मेरे ऐसा कहने के पीछे यह मकसद नहीं कि मीडिया के सभी कार्य साफ सुथरे है. मीडिया की भी आलोचना होनी चाहिये. समाज के अंतस्‍थल से विचार आने चाहिये. मीडिया को अपने भीतर झांक कर मूल्‍यांकन करना चाहिये. जिस प्रकार समाज के सभी वर्गो में हताशा, स्‍पर्द्वा, घ़णा बढी है, तनाव बढा है, संघर्ष करने की क्षमता घटी है वैसे ही मीडिया भी इसका शिकार हुआ है. हम अक्‍सर ऐसा सुनते है कि फलां तो गडबड था लेकिन मीडिया को ठीक होना चाहिये था. ऐसा कहकर हम क्‍या कहना चाहते है कि बाकी सब चोर हो जाए और मी्डिया साधुता प्रद्वर्शित करते रहे. नही ऐसा कदापि नहीं हो सकता. हमे गलत को गलत व सही को सही कहने की आदत डालनी होगी. थोडी देर के लिए जो अच्‍छा प्रतीत हो रहा हो उसे समाजहित में हमेशा के लिए अच्‍छा नहीं कह सकते. हमें उसकी पहचान करनी होगी कि अमूक घटना या विचार अपने आप में कितनी सार्थकता लिए हुए है. हमें अपने प्राचीन गौरव को याद करना होगा कि क्‍या इसी के लिए हमें स्‍वतंत्रता मिली थी, इसके लिए ही बलिदानों ने अपनी आहुति दी थी.

2 comments:

Amit K. Sagar said...

आपने भरपूर कोशिश की है, दोषी को तलाशने की.!!!..वहीं ये मुद्दा बेहद अच्छा लगा, वक़्त की पैदायश...इसमें दोषी कहीं न कहीं कुछ किस्म के पत्रकार भी हैं...गहन विमर्श v अध्ययन की भी नजाकत को तलब करता है...आपका लेख. बहुत-बहुत शुक्रिया...
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कोई हल निकले तो बात बने...कि हर तरफ हर मसला खबर ही क्यों बने?
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उल्टा तीर

jasvir saurana said...

aacha likha hai aapne.likhate rhe. please aap apna word verification hata le.taki hame tipani dene mei aasani ho.