Wednesday, December 10, 2008

आतंकवाद का सरलीकरण,भाजपा की शिकस्‍त

हाल ही में पांच विधान सभा चुनावों के परिणाम सामने आये। यह संयोग ही है कि मुंबई की आतंकी घटनाओं के बीच पांच राज्‍यों छतीसगढ, मध्‍यप्रदेश, राजस्‍थान,मिजोरम व दिल्‍ली में चुनावों के दौरान राजनेताओं की सरपट दौड जारी थी। कमोबेश जम्‍मु कश्‍मीर में भी चुनाव के दौरान राजनेताओं की अच्‍छी खासी भागेदारी रही है. इन सभी स्‍थानों में जनता ने बडी ही बारिकी से राजनीतिक दलों का चुनाव अभियान को देखा. भारतीय जनता पार्टी को पांच राज्‍यों के चुनाव परिणामों में थोडी निराशा हाथ लगी है। इस पर भी वो अगर समय रहते सचेत नही होती तो संभव है एक बार फिर लोकसभा के चुनाव में अगले पांच वर्षो के लिए हासिए पर ही स्थिर रह जाए। दरअसल भाजपा ने विध्‍ाान सभा चुनाव में आतंकवाद को प्रमुख मुददा बनाया. पोटा कानून को हटाये जाने तथा अफजल को अबतक फांसी नहीं दिये जाने के मामले को हवा दी. आतंकवाद को इतना सरलीकरण आम जनता को तनिक भी नही भाया।आखिर हम कबतक इतने अगंभीर तरीके से किसी बडी समस्‍या को देखते रहेंगे. देश की एक अरब से अधिक की आबादी में मुसलमानों का हिस्‍सा 18 फीसदी के करीब है,शेष अन्‍य अल्‍पसंख्‍यक समुदाय की आबादी भी शामिल है. क्‍या देश के बहुसंख्‍यकों द्वारा अल्‍पसंख्‍यकों के मन से भय,डर व शक को बिना हटाये देश की राष्‍ट्रीय समस्‍याओं से निजात पाया जा सकता है। बहुलतावादी संस्‍क़ति वाले इस देश में हमारी एकजुटता ही विकास व समस्‍यों से मुक्ति का वायस बन सकती है। चाहे जो भी राजनीतिक पार्टी हो अल्‍पसंख्‍यकों की तुष्टिकरण करके सत्‍ता के गलियारे में पहुंचना चाहती हो, या बहुसंख्‍यकों की भावना को भडका कर अपना उल्‍लू सीधा करना चाहती हो, आने वाले समय में उन्‍हें घोर निराशा ही हाथ लगने वाली है। भारतीय गांधी युग में भी न इतने तंगदिल थे, न नेहरू युग में,अब तो देश के बंटवारे, राजनीतिक उथल पुथल, दंगे फसादों के दूष्‍परिण्‍ााम झेलते झेलते इतनी समझ विकसित कर चुकी है कि उसे आसानी से बरगलाया नही जा सकता। मुंबई में हुए आतंकवादी घटनाओं के बाद तो वह इतनी सर्तक हो चुकी है कि आने वाले दिनों में कांग्रेस,भाजपा,सपा या अन्‍य क्षेत्रीय दलों द्वारा किये जाने वाले कवायद को धूल चटा सकती है। राजनीतिक दलों पर नैतिक दबाब बन सकता है कि वे अच्‍छे उम्‍मीदवार दें, प्रशासन में पारदर्शिता लाए। राष्‍ट्रीय महत्‍व के प्रश्‍नों को गंभीरता से हल करें। इस बार के विधान सभा चुनावों ने राजनीतिक दलों को सचेत हो जाने का एक बार फिर मौका दिया है.

2 comments:

archana rajhans said...

प्रिय बलिदानी, कौशलेंद्र मैं नहीं समझती कि आपकों इस नाम से संबांधित करने में कुछ भी गलत है। आपकी लेखनी आपको सचमुच बलिदानी पत्रकार साबित करती है। आतंकवाद को आपने जिस नजरिए से देखा है, वह अदभुत है। विरले लोग ही विषय की इतनी बारीक समझ रखते हैं।
ठाकरे की राजनीति व नपूंसकों की जमात वाली छोटी सी टिप्‍पणी भी मैंने गौर से पढी। एक शब्‍द में कहना हो तो इसे भी अदभुत कहुंगा।
अगर आप अन्‍यथा न लें तो एक बात कहूंगी कि आप अपने लेख अधिक लंबे न लिंखें। यह मैं दावे के साथ कह सकती हूं कि कम शब्‍दों में भी प्रभावी ढंग से अपनी बात कहने की क्षमता आपके पास है।
साथ ही यह भी कहने से खुद को रोक नहीं पा रही हूं कि आपके और मेरे विचार काफी मिलते हैं। उम्‍मीद है मेरी ओर बढा दोस्‍ती का यह हाथ हमारे बीच निरंतर संवाद के रूप में जारी रहेगा।

archanabetu said...

I am quite unaable to understand that who did this.in spite of it i would like to say sorry to you. I dont know who can do such stupid comment on behalf of me. i never seen ur blog so far. u may right well bt i hv no personal comment on it. please ignore the comment. and i m sorry once again.

archana rajhans