Saturday, August 11, 2018

जीवन पथ पर आत्मावलोकन

जीवन चक्र घूमता है तो घूमता चला जाता है, तब आपके पास न तो हाथ में ब्रेक होता है और न ही हार्न जो मार्ग को निष्कंटक बनाने में सहायक हो। सर पर हैलमेट न होने से खतरा और भी बढ़ जाता है। जीवन में कई ऐसे अवसर आते है, जहां आपको सब कुछ छोड़ कर आगे बढ़ जाना होता है, आगे खाई है या ऊंचे पहाड़ बस, चलते जाना है। इसी क्रम में आज अपने पुराने ब्लॉग से सामना हो गया। कई पुराने बीते पल याद आ गए।

छह वर्षो के बाद इस ब्लॉग पर आना हुआ। फुर्सत के पलों के अभाव में भी रचनाक्रम से जो मानसिक संतुष्टि मिलती थी, वो कहीं गुम हो चुकी थी। सिर्फ आगे बढने के जुनून में आत्म संतुष्टि प्रदान करने वाली रचनाधर्मिता का पुन: हासिल होना, बेहद रोमांचित करने वाला पल बन जाता है। यह पल संजोए जाने योग्य है। 

Wednesday, April 4, 2012

दुर्लभ पुस्तको का संग्रहण और उपलब्धता

इस देश में ज्ञान विज्ञानं की कई दुर्लभ पुस्तके यत्र तत्र बिखरी पड़ी हैं , उन के गुणग्राहक भी कम होते जा रहे हैं, उनकी उपलब्धता तो अत्यंत ही दुर्लभ हैं। हिंदी पट्टी में इस मिजाज की शुरु से कमी रही हैं। लोग संग्रह करते नहीं, दुर्लभ पुस्तके हो तो उसकी चर्चा नहीं करते, किसी गुणग्राहक को उपलब्ध करना तो मुश्किल ही हैं। अंग्रेज इस मामले में हमसे आगे रहे हैं । उन्होंने कई महत्व की चीजे पहले ही संग्रह कर ली और उसे अपने देश ले गए। कुछ तो अनुवाद के साथ प्रकाशित भी किये। अभी कल की बाट हैं, नेपाल के राजप्रसाद में संगृहीत कालिदास रचित देवी स्त्रोत देखने को मिली। भगवती के श्री मुख से स्वयम की स्तुति वंदना। एक श्रद्धालु ने इसे प्रकाशित करा कर निशुल्क वितरित किया। पता चला कई विद्वानों ने नेपाल से निकल कर इस सामग्री के भारत-- बिहार आने के बाद साऊथ में ले कर चले गए थे जहा इसमें कुछ तथ्य जोड़ कर उसे प्रकाशित कराया था। बाद में वह भी मिलना मुश्किल हो गया । दावा किया गया की यह दख्खनमें पहले से उपलब्ध हैं। खैर, हम तो उस की प्राचीनता और उसकी उपादेयता को ले कर चिंतित हैं , क्या ऐसी दुर्लभ सामग्रियों को भारत में धुल ही खाना नसीब होता हैं। हमारे पेड़ पौधे, खाद्दान, परम्पराए सब पर जब तक पश्चिम की मुहर नहीं लगे, तब तक क्या वह महत्व की नहीं हैं। लाईब्रेरियो में बिखरी ऐसी सामग्रियों का कोई कद्रदा नहीं मिलता। सरकारी संस्थाए पैसे और अवार्ड की लुट खसोट में जुटी हैं । आखिर कब तक हमारी रगों में अपनी विरासत के प्रति ऐसा ठंडापन रहेगा। मैंने अपनी आँखों तीसरी से लेकर ९ वी शताब्दियों तक के भारतीय विद्वानों द्वारा लिखित भाष्य, टीका, पुस्तके देखी हैं। जिनके नाम भी सुनने को नहीं मिलते। कई पुस्तके तो तत्कालीन अंग्रेज अफसरानो द्वारा जिलो में तैनाती के दौरान संगृहीत की गयी और उसे अंग्रेगी अनुवाद के साथ प्रकाशित की गयी। उनके भी खस्ता हाल हैं । क्या हम ज्ञान को ले कर इस ज्ञान युग में दुसरो पर आधारित रहेंगे। बिहार के कई गाव आज भी हैं जहा १२ वी सदी की दुर्लभतम पुस्तके जीर्ण शीर्ण अवस्था में हैं। देश में सरकारे घपलो घोटालो में जुटी हैं। नैतिक पतन पराकाष्ठा पर हैं। दिखावे की दुनिया अजब तेरी रीत, गजब तेरी प्रीति। इंटेर नेट के युग में भाषाए तो लुप्त हो ही रही हैं हमारे अमूल्य ज्ञान भी खोते जा रहे हैं। वे लोग जिन्होंने अथक साधना के बाद दुर्लभ ज्ञान की प्राप्ति की, उसे जन सामान्य के लिए सुलभ कराया , हम उसकी कद्र न कर सके।
फंतासिया गढ़ते रहे, रोजमर्रा की सामने थी दुश्वारिया -- न वो समझ सके न हमें समझ हुई ।

Tuesday, March 27, 2012

बोलियों के बीच खड़ी बोली हिंदी

भारत में कई बोलिया हैं जो हिंदी पट्टी में बोली और हिंदी भाषियों के बीच स्वीकारी जाती हैं। २०११ की जनगणना में इनकी संख्या भी दर्शायी गयी हैंजो की दो अंको में हैं। साथ ही एक सर्वमान्य तथ्य हैं कि खड़ी बोली को ही हिंदी मान लिया गया हैं। अवधी, ब्रज, भोजपुरी सहित अन्य बोलिया हिंदी के पास नहीं दिखती। खड़ी बोली का प्रयोग संपर्क भाषा के रूप में न केवल हिंदी पट्टी में बल्कि अन्य क्षेत्रो में की जाने लगी हैं। ऐसे में वर्तमान हिंदी के मानक रूप को विस्तृत पटल पर ले जाने की आवश्यकता महसूस की जा रही हैं। हिंदी की नीरसता को दूर करने की दृष्टि से ऐसा करना जरुरी हैं । आम पाठको तक उसे ले जाने की पहल आवश्यक हैं। हिंदी भाषा का शब्द सामर्थ्य दिनों दिन बढे , उसकी सर्व ग्राहता में इजाफा हो। ऐसा नहीं की हिंदी की अन्य बोलियों में ताजगी और भावो की अभिव्यक्ति की क्षमता नहीं हैं। कई शब्द तो विशिष्टता के साथ अपनी अभिव्यक्ति में सफल हैं। दूसरा पक्ष ये भी हैं कि क्या मानक हिंदी में छेड़छाड़ की जानी चाहिए। क्या भाषा की शुद्धता की दृष्टी से ऐसा किया जाना उचित होगा। भाषा को कोई एक मानक आधार तो चाहिए ही जिस पर रचना की प्रक्रिया निर्धारित की जा सके । यहाँ ध्यान रखने की जरुरत हैं कि संस्कृतनिष्ठ हिंदी को अब गैर जरुरी मान लिया गया हैं। सुधि पाठक इसे अपनाने में कठिनाई महसूस करते हैं। आज की युवा पीढ़ी तो कंप्यूटर के की बोर्ड पर हिंदी शब्दों को अंग्रेजी में लिखती हैं। उनके लिए तो क्लिष्ट हिंदी को भाव रूप को प्रस्तुत करना असंभव तो नहीं लेकिन मुश्किल भरा काम अवश्य हैं। फिर कैसे हमे विभिन्न बोलियों के बीच खड़ी बोली को रखना हैं या सब की स्वतंत्र सत्ता को गडमड करना हैं इस पर विचार करना होगा। लोकतान्त्रिक प्रणाली में सब बोलियों की अपनी अहमियत हैं तो क्या हमें खड़ी बोली के समक्ष अन्य बोलियों की प्रतिस्पर्धात्मक स्वरुप को खड़ा करना होगा। इससे इतर भी एक स्वरुप ये भी हो सकता हैं कि हमें सब को समान भाव से अंगीकार करते हुए उसे के नये स्वरुप को स्वीकार कर लेना होगा.

Saturday, February 4, 2012

मानसिक रूप से बीमार बच्चे की तरह हैं भारतीय लोकतंत्र

सुप्रीम कोर्ट का २ जी स्पेक्ट्रम मामले में दिया गया फैसला भ्रष्टाचार के खिलाफ जबरदस्त हमला हैं। भारतीय लोकतंत्र का दुखद पहलु यह हैं की जितना देर से सरकारी राशी के गबन या भ्रष्ट आचरण की जाँच होती हैं, उससे कही ज्यादा देर न्याय निर्णय के आने में लग जाता हैं । लम्बी सुनवाई के बाद जब फैसला होता भी हैं तो उसे अमलीजामा पहनने में और भी देर हो जाती हैं । न्याय की जरुरत ऐसी हैं जो न्याय होता दिखे। आम आदमी के गाढ़ी खून की कमाई को डकार कर कैसे कोई रह सकता हैं। संसद में जिस प्रकार की नुख्ताचिनी होती हैं , वह लोगो के गले नहीं उतरती। भारतीय लोकतंत्र के हालत मानसिक रूप से विकलांग बच्चे की तरह हैं। ६० साल से ऊपर की उम्र हो चुकी लेकिन लोकतान्त्रिक मानसिकता १५ साल के बच्चे की तरह हैं । सरीर रोग से जीर्ण शीर्ण होने चला हैं लेकिन हम हैं कि अभी लेमनचूस के लिए लड़ रहे हैं । भारतीय प्राकृतिक संसाधनों कि जिस प्रकार बंदरबाट कि जा चुकी हैं उससे अव्यवस्था होनी ही हैं । हम भारत के लोग लोकतान्त्रिक गणराज्य का दावा करते हैं और मानवता कि दुहाई देते हैं किन्तु हर नागरिक दुसरे के अधिकारों के अतिक्रमण में जुटा हैं ।
२ जी या कोई भी घोटाला नियमो कायदों को तक पर रख कर कैसे हो जाता हैं जबकि एक सामान्य आदमी को राशन कार्ड बनाने से लेकर अस्पताल में इलाज करने तक कु व्यवस्था का अंतहीन दौर देखना पड़ता हैं । अन्ना के समर्थक हो या विरोधी, गाँधी के अनुयायी हो या सुभाष के भ्रष्टाचार के कोढ़ से कौन अछूता हैं। पर्यटन , उधोग या उपभोक्ता वर्ग को संतुष्ट करने वाले सामानों के ब्रांड अम्बेसडर बनाने से तो बेहतर हैं सामाजिक राजनीतिक कुरीतियों के खिलाफ शंखनाद करे। पोलियो को जड़ से मिटाए , कुपोषण दूर करे। बच्चो को शुद्ध दूध उपलब्ध कराए, देश में उर्जा शक्ति, सैन्य शक्ति का विकास करे।

Monday, January 2, 2012

नववर्ष का आगमन, नई उर्जा का संचार

नई उर्जा, नई चेतना, हर चीज में नयापन, दृष्टी नई , सोच नई, नया कुछ करने का संकल्प । नए वर्ष का शुभ आगमन। भारत भूमि की उर्वरता बढे , अन्न हमारी रगों में नई जोश और उमंग का संचार करे। जल अपने सा निर्मल बनने की प्रेरणा दे, वायु जीवन को गतिशील बनाए, उर्जावान बनाए। छितिज की ओर दृष्टी हो, जो कभी न मिलकर भी अपनी सम्पूर्णता का अहसास कराए। आकाश ईश्वर की कृपा हम सबो के प्रति बनाए रखे। अग्नि तो स्वयं देव हैं, वे हमारे कष्टों का निवारण कर कुंदन सी आभा प्रदान करे। जब हम नए का सृजन करते हैं तो पहला अन्न ईश्वर को समर्पित करते हैं, भारत भूमि की मिटटी में इस संस्कृति का विस्तार हुआ हैं। हम सब उसी परम पिता की संतान हैं जिसने हमें जन्म दिया हैं , जीवन बक्शी हैं। क्षमा हमारा धर्म हैं, परोपकार करना हमारा कर्तब्य हैं । अंग्रेजी कैलेंडर किसी नई बात का सृजन नहीं करता, वह धान की कटनी के बाद आयोजित होने वाला हर्षौल्लास का वक्त नहीं हैं , फिर भी हम तनाव से इतने भरे हैं कि ख़ुशी का एक पल इसमें ढूढ़ लेते हैं। उत्सव के बिना जीवन एकाकी हो जाता हैं, यही कारण हैं कि हम किसी के विदा लेने पर दुखी हो जाते हैं तो किसी के मिलने पर खुशी का अनुभव करते हैं । जीवन में पल प्रति पल छुट रहे को हम नहीं अनुभव कर रहे, वर्ष में एक दिन संकल्प का ढूंढते, यह दिन हमारे लिए महत्वपूर्ण हो जाता हैं। हम पल प्रति पल को महत्वपूर्ण बनाए तो कितना सुन्दर हो । आइये, हम अपनी सकारात्मक उर्जा को राष्ट्र सेवा में लगाये। भ्रष्टाचार का खात्मा करे , शांति स्थापित करे

Tuesday, December 20, 2011

भिखारी के गांव में अनगढ़ कला का सौन्दर्य बोध

" जा उधो अतने सुधि काहीह, तनिको सहत नइखे पीर,कहत भिखारी बिहारी न आइले, फूटी गईले तक़दीर " गीत की प्रस्तुति और लाल जैकेट में लोक मंच पर विदेशिया की भूमिका में उतरे ८० वर्षीय गोपाल जी, बटोही शिवलाल व् प्यारी सुन्दरी बने लखन मांझी ने जब समा बंधा तो शामियाना में ठिठुरते दर्शको के बीच उत्साह का संचार हो गया , तालियों की गूंज उनकी गर्म जोशी को व्यक्त करने लगी। इसके पूर्व " लव कुश के सामने सब के टूटल अभिमान- भगवान भगवान के बोल पर झाल व तबले की थाप लगी तो मुबई फिल्म इंडस्ट्री के नामचीन कलाकार भी अपने को रोक न सके । सबके पैरो और उंगलियों की थिरकन सी आ गयी। मौका था लोक चेतना के महान विभूति भिखारी ठाकुर की १२४ वी जयंती पर उनके गांव कुतुबपुर में सांस्कृतिक महोत्सव का। मिटटी की खुशबु, भोजपुरी की खनकव् लोक कलाकारों का भिल्हारी ठाकुर के प्रति अनन्य श्रधा की बानगी देखते ही बन रही थी। कुतुबपुर में अनगढ़ कला का अनुपम सौन्दर्य बोध हर किसी को अपनी ओर आकर्षित कर रहा था। पटना मुंबई की चमक दमक से दूर दियारा छेत्र में गांव गवई के बीच स्थानीय भाषा में उठी यह सांस्कृतिक गूंज विरासत के प्रति अनन्य आस्था को अभिव्यक्त कर रही थी।

Thursday, November 17, 2011

१०० वर्षो बाद बटवारे की राजनीति

आज से ठीक १०० वर्ष पहले १९११ में ब्रिटिश हुकूमत ने अपने स्वार्थ के मद में अंधे हो कर बिहार के विभाजन का निर्णय किया था, १९१२ में बिहार बंगाल से अलग हो गया। थोडा पीछे देखे तो १९०५-०६ में बंग भंग के विरोध में एक लहर सी देश में उठी थी। आज भी हम उसी मानसिकता में जी रहे हैं। छोटे राज्यों की हिमायती कम नहीं हैं इस देश में लेकिन क्या हम राज्यों के विभाजन से प्रदेश के विकास की कल्पना कर सकते हैं , यह एक प्रश्न चिन्ह हैं। फिर से उत्तर प्रदेश को चार भागो में बाटने की कोशिश की जा रही हैं। क्या कोई विजित या विजेता राष्ट्र की तरह लोकतंत्र को हाक सकता हैं। देश पहले ही १९४७ में एक बड़े बटवारे का दंश झेल चूका हैं। इसके बाद भी राज्यों का पुनर्गठन किया गया हैं। क्या सभी विभाजित राज्यों के विकास अथवा पिछड़ेपन को ले कर कोई स्वतंत्र अध्ययन हुई हैं। विभाजन के अतिरिक्त क्या कोई अन्य उपाय नहीं हैं । आज झारखण्ड, छतीसगढ़ व् उतरांचल के विकास की रूपरेखा क्या संतोषप्रद हैं। सिर्फ राजनितिक स्वार्थ के लोभ से सब कुछ बाट देना कहा तक उचित हैं। राजनीतिक लोगो से भी गुजारिश हैं , बंद करे यह बटवारे की राजनीति। एक गाना यद् आता हैं - इस दिल के टुकड़े हजार हुए कुछ यहाँ गिरा कुछ वहा गिरा। कभी तो एकता, विकास और मुल्क की तरक्की की बाते करे। आजादी के ६० सालो बाद भी हम कहा हैं , इस देश में महात्मा गाँधी की सोच और सपनो का भारत कहा हैं , इसे ढूंढे। आधुनिकता की अंधी दौड़ में देश को रसातल में न ले जाये। अमीरी और गरीबी की बढती खाई आज १०० गुनी चौड़ी हो गयी हैं। इसे पाटने का प्रयास करे

Friday, October 21, 2011

महलो से छन कर रौशनी झोपड़ो तक पहुचे

सावधान हो जाये, दीपावली में एक बार फिर मिलावटी खाद्य पदार्थो की बिक्री चरम पर हैं। बिहार व् उत्तर प्रदेश में पुलिसे की हो रही लगातार छापेमारी से मिलावटी वस्तुओ की बरामदगी जारी हैं। अब तो हर आदमी कोई टेस्ट पेपर ले कर नहीं घूम रहा, दूसरी ओर बाजार उनकी सेहत और पैसे पर नजर गडाए हुआ हैं। अब तो हमारे पर्व त्यौहार भी मिलावट करने वालो के लिए एक अवसर में तब्दील हो चूका हैं । कौन इन पर निगरानी रखे जब मुहल्ले के छोटे छोटे दुकानों से लेकर बड़ी दुकानों तक में ये रोग फैल गया हो। आये , हम अपनी सेहत और श्रद्धा का खुद ख्याल रखे । दीपावली के दिन बच्चे, बड़े स्त्री व् पुरुष सभी मुह मीठा करते हैं, अगर मिठाई नकली हो तो जायका तो बिगड़ेगा ही साथ ही डाक्टर की शरण में जाना पड़ सकता हैं। आजकल बड़े बड़े बिजनेस फार्म अपने शुभचिंतको को विशेष कर सरकारी महकमो में कम करने वालो को मिठाई गिफ्ट करते हैं । यह एक नए किस्म का भ्रष्टाचार हैं। इससे हम अपने बच्चो को कौन सी खुशिया दे देंगे पता नहीं। अव्वल इन मिठाइयो के आर्डर व पैकिंग कई दिनों पूर्व से होने लगती हैं , इसे में इन्हें खा कर धोखा भी हो सकता हैं । हमें अपने घरो में दिए जलाने के साथ यह भी ध्यान रखना चाहिए की आजाद भारत में अब भी कई ऐसे घर हैं जहा सालोभर रौशनी नहीं होती क्या इन घरो को रौशन करना हमारा दायित्व नहीं हैं । देवी लछमी क्या उधर भी देखेंगी। ५४० टन सोना भारत में बिक्री के लिए आयात किया गया हैं, सोने की मांग भारत में प्रति वर्ष बढ़ रही हैं, क्या इन गरीबो की झोपडी में भी सोना बरसेगा। लाखो भारतीय आज भी स्वच्छ पेयजल, शौचालय को तरसते हैं , खाने को दोनों वक्त भोजन नसीब नहीं होता...क्या उन तक जरुरत की चीजे उपलब्ध कराइ जा सकती हैं। आप कहेंगे कौन इतना सोचता हैं, लेकिन यह जान ले की इन समस्याओ से मुह मोड़ कर हम अपने पैरो पर कुलाढ़ी मार रहे हैं , टैक्स में बढ़ोतरी, महंगाई की चरम सीमा, महंगी होती सुबिधाये एक दिन अपने साथ साथ सब को डुबोने में कामयाब होगी, जिस पश्छिम की नक़ल में हम बेतहासा भाग रहे हैं वो उसी तरह बर्बाद करेगी जिस तरह आज उन मुल्को में दिखाई पड़ रहा हैं। आइये इस बार दीपावली में कुछ ऐसा करे कि महलो से छन कर रोशनी कि कुछ छटा झोपड़ो पर भी पड़े , ताकि उनके घर आँगन में भी देवी कि कृपा हो और हम सब भारतवासियों का जीवन खुशहाल हो। देवी लछमी की सवारी हर घर तक पहुचे। मिल्लत और खुशियों से अपना चमन गुलजार रहे । आप सोना ख़रीदे तो गरीब के पास एक थाली तो हो जिसमे वो भरपेट खा सके, उसमे कोई छेड़ न हो सके।

Wednesday, September 28, 2011

नवरात्र का शुभारम्भ, बुराइयों का हो सर्वनास

आज से अश्विन मास की नवरात्र का शुभारम्भ हो गया। माँ दुर्गा सब की मनोकामना पूर्ण करे, बुराइयों का सर्वनास हो। माँ की आराधना के अवसर पर हम २ जी घोटाला, कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाला, शहीदों के नाम पर बनने वाले आदर्श सोसायटी में घोटाला इत्यादि से मुक्ति का संकल्प ले। भारत माता के मान-सम्मान और मर्यादा को ह्रदय में स्थान देते हुए , राष्ट्र प्रेम का अलख जगाये। मशहुर उक्ति हैं कि कफन में जेब नहीं होती, फिर यह धन लिप्सा आखिर क्यों, दुसरो के अमन चैन को लुट कर एसी में साउंड स्लिप का प्रयास क्यों । अपने पूर्वजो को याद करे, कैसे अंग्रेजी दस्ता के बीच आनंद मठ के रचयिता बकिम चन्द्र चटर्जी ने जननी जन्मभूमि की वंदना माँ भवानी के रूप में की हैं। इस मिथ्या जगत में निवास करते हुए क्या जन्मभूमि के प्रति कृतज्ञता ब्यक्त नहीं की जा सकती। जिस भूमि ने पीने को जल दिया, खाने को फल फूल दिए, जिसकी आगोश में विश्राम किये, जिसने छाती भर श्वास लेने को शुद्ध वायु प्रदान किये , क्या हम इतने कृत्घन हैं, उसे अपना प्यार व स्नेह भी नहीं दे सकते, उसे प्रदुषित करते रहे , उसकी चिंता करने की जगह, उसकी संपदा का सार्वजनिक उपयोग करने की जगह हम लुट खसोट में जुटे हैं , जेल जाने को शान समझ बैठे हैं। बाजार की हवा ने सब कुछ बिकाऊ बना दिया हैं। माँ दुर्गा हम सब को सदबुधि दे, स्त्रियों का सम्मान हो, स्त्रिया अपनी मर्यादा का उल्लंघन न करे। बच्चे अनुशासित व संस्कार युक्त बने। सिर्फ नुकसान के भय से पूजा या आराधना करना अपने आप को संतुष्ट करने का थोथा प्रयास हैं । आये हम सर्वजन हिताय , सर्वजन सुखाय की मंगल कामना से पूजनोत्सव में शामिल हो.........

Tuesday, August 23, 2011

केंद्र की हठधर्मिता और देश में तूफान का आगाज

अन्ना हजारे के सत्याग्रह को लेकर भ्रष्टाचार के विरुद्ध राष्ट्र व्यापी माहौल बना हैं । यह एक दिन की पीड़ा नहीं , आजादी के बाद से गरीबी की चक्की में पिसते लोगो की भ्रष्टाचार ने कमर तोड़ दी हैं। टूटे हुए लोगो की पीड़ा से अन्ना की पीड़ा जा कर जुड़ गयी हैं। महंगाई, भ्रष्टाचार, सामाजिक भेदभाव, पूंजी का केन्द्रीकरण , राष्ट्रीयता की भावना का लोप कई ऐसी समस्याए हैं जो व्यक्ति के विकास में बाधक बने हुए हैं। भारत के राष्ट्रीय चरित्र में जिस प्रकार की गिरावट आई हैं वो शर्मशार करने वाला हैं। संसद की सर्वोचता को लेकर बेबजह बहस चलायी जा रही हैं। क्या इस देश में आम नागरिक या ग्राम पंचायतो की सर्वोचता को लेकर कभी विचार किया हैं। क्या हमारे लिए हमेशा बेघर, भूखे ,निहंग लोगो की आवयश्कता गैर जरुरी रहेगी। इस देश में लुट का खेल चलता रहे और लोग देखते रहे ऐसा कबतक चलेगा। अन्ना कोई नई या अनोखी बात नहीं कर रहे हैं वो तो सिर्फ निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को आइना दिख रहे हैं । वे संसद में क्या करते हैं , उन्हें क्या करना चाहिए । क्या कोर्ट या जन दबाब के बाद ही सरकारे जगती रहेंगी । उनकी अपनी कोई जिम्मेवारी नहीं हैं । विरोधी दल के बाते राजनीतिसे प्रेरित मन ली जाती हैं । सत्ता सञ्चालन में विरोधी दल की भी प्रमुख भागीदारी होती हैं। आम आदमी भी गजट के प्रकाशन से सीधा सम्बन्ध रखता हैं । नहीं तो फिर जनता की राय लेने गजट के प्रकाशन का आखिर क्या मकसद हैं । मिडिया जो आज अन्ना के साथ चिल्ला रही हैं उसे भी अपनी गिरेबान में झाकना होगा। मंत्री जेल जाये और २ जी में शामिल मिडिया की हस्ती बाहर रहे ऐसा नहीं हो सकता। भ्रष्ट आचरण हमेशा निंदनीय हैं । सिर्फ फैशन के लिए सत्याग्रही होना और बात हैं । महात्मा गाँधी के समय भी जेलों में जा कर फाकते उड़ना और बरसाती मेढको की भाती सत्याग्रही बन जाने की बाते प्रमुखता से होती थी लेकिन सत्य की एक दिन जीत हुई लोगो के ह्रदय में महत्मा का जादू सर चढ़ कर बोला ...मोहन दास करमचंद गाँधी एक मिथक बन गये । अन्ना तो बस उनके अनुयायी हैं उनकी ताकत कई गुना बढ़ कर आम जन जीवन को प्रभावित कर रही हैं ऐसे में भला सरकार कैसे अप्रभावित रह सकेगी। भारत के लोग आशावादी होते हैं , वे जब जग गए तो फिर उन्हें सोने के लिए कहना शेर को छेड़ने के समान हैं ...

Thursday, August 18, 2011

अन्ना के सत्याग्रह से केंद्र की फजीहत

भ्रस्टाचार के विरोध में अन्ना के उठ खड़े होने के बाद केंद्र सरकार की फजीहत हो रही हैं। यह इतना संवेदनशील मसला हैं जिससे हर आम नागरिक परेशान हैं, मैंने खास की बात नहीं कर रहा क्योकि वे तो अपने साधन के सहारे इस परेशानी को झेल लेते हैं। कई बार तो वे भ्रस्टाचार को एक आसन रास्ता मानते हैं । अन्ना की ईमानदारी पर उनकी सत्य निष्ठा पर सवाल नहीं खड़ा किया जा सकता हैं । अन्ना की टीम ने जो मिडिया मैनेजमेंट किया वो काबिले तारीफ रहा । सरकारी अमला फेल साबित हुआ । अन्ना का भ्रस्टाचार की जड़ पूंजीवाद के विरुद्ध कुछ नहीं बोलना थोडा खलता हैं क्योकि वही तो इसे बढ़ावा देता हैं । पूंजीवाद आगे बढ़ने की होड़ में सभी गलत तरीको को प्रश्रय देता हैं। भले ही आन्दोलन का ह्रस नाउम्मीदी भरा हो लेकिन युवा वर्ग को एक नई दिशा मिली हैं । वो आगे बढ़ ने को तैयार हैं। वो किसी ऐसी व्यवस्था को नहीं चाहता जो देश के विकास में बाधा कड़ी करता हो। देश का हर नागरिक इससे मुक्ति चाहता हैं । पुरे आन्दोलन से महंगाई नेपथ्य में चला गया हैं इसे अन्ना की टीम ने गंभीरता से नहीं लिया हैं । दो जून भोजन गरीबो को नहीं मिलेगा तो वो भ्रस्टाचार की जगह अपराध का सहारा लेंगे .

Wednesday, August 3, 2011

मुख्यमंत्री के आवास पर मिडिया से हुए रूबरू

अमिताभ बच्चन ने मुख्यमंत्री नितीश कुमार से मुलाकात की। उस दौरान थोड़ी देर को मिडिया से भी बाते की। इसके पूर्व प्रकाश झा के मौल पर उन्होंने घंटो मिडिया कर्मियों से बाते की । मुख्यमंत्री आवास पर मैंने पूछा कि कैसा लगा बिहार आना लम्बे समय के बाद तो बड़ी सहजता से कहा बिहार बदल रहा हैं ,सुन्दर हैं । दोबारा आने को पूछा तो वही बच्चे सा मासूम जबाब कल मन किया तो फिर आ जाऊंगा । चंद लम्हे भी अमितजी जैसे वयक्तित्व के साथ हर कोई गुजरना चाहता हैं .

आज अमिताभ पटना में

आज बिग बी अमिताभ बच्चन अपनी फ़िल्म के प्रचार के सिलसिले में पटना में रहेंगे । वे रात में यहा रुकेंगे । पटना आना उनका एक जमाने के बाद हो रहा हैं। कुछ दिनों पूर्व हमारे यहाँ प्रभात खबर में उनके पुत्र अभिषेक आये थे । छोटे शहरो की ओर उनका आना यादगार पल हो जाता हैं क्योकि बड़े शहरो में तो वे प्रायः जाते रहते हैं। इश्वर उनकी फ़िल्म को सफलता दे। उनके फैन पुरे देश दुनिया में हैं। खास कर अमित जी एक बड़े व्यक्तित्व हैं , एक संवेदनशील पिता के योग्य संतान हैं । देश को उन पर फक्र हैं .

Wednesday, June 8, 2011

पत्रकारिता की दशा- दिशा और वर्तमान भारत

भारतीय राजनीति जिस परिस्तिथी से गुजर रही हैं वहा भारतीय पत्रकारिता अपने लिए जगह नहीं बना पा रही हैं। ऐसी मजबूरी भारतीय पत्रकारिता को पहले कभी नहीं झेलनी पड़ी थी । इसका एक मात्र कारण हैं , जन समस्याओ से मिडिया का कटते जाना । जब कार्पोरेट घरानों की गोद में देश की राजनीति और मिडिया खेलने लगे , चमकते चेहरों के बीच आम आदमी की दुश्वारिया बढती जाये तो फिर क्यों कर देश भक्ति की राग अलापी जाती हैं पता नहीं । मन दुखी हो जाता हैं जब यह सोचता हू की गुलाम भारत में कम पढ़े लिखे नेताओ में भी विजन था, पत्रकारिता भी निष्ठावान थी अपने धेय के प्रति। भारत में प्रतिभा का विस्फोट हो रहा हैं, सुचना क्रांति के युग में हम पहुच चुके हैं, वैश्विक राजनीति में परिवर्तन आ चूका हैं फिर भी हम हैं की सुधरने का नाम नहीं ले रहे। कौन सा स्थायी महल बना लेंगे, कौन सी स्थायी कीर्ति अर्जित हो जाएगी जो अमिट होगी। इस पल पल नाशवान धरा में जब हम अपने बंधू बान्धवों के साथ थोडा सुकून से न जी सके , एक दुसरे के कम न आ सके तो दरिद्र में नारायण को न पा सके तो फिर कहे की मारामारी। ये कनिमोंझी, ये २ जी स्पेक्ट्रम और राजा, कलमाड़ी एक नहीं कई अपने आस पास ही दिख जाएँगे। हमने अपना राष्ट्रिय चरित्र ही बेच दिया हैं। किसी मौके पर तो वेश्या भी apna घुंघुरू तोड़ देती हैं मगर ये हमारे नेता और टीवी, नोट और दारू की बोतल पर पंचायत से संसद तक के लिए वोट बेचती जनता.... विकट हो गया हैं भले आदमी का जीना. आन्ना हजारे हो या बाबा रामदेव जिसे वतन पर फिदा होना हैं उन्हें ....सब को लंगोटी धारण कर भारत माँ की मर्यादा को बचाना होगा .

Saturday, May 14, 2011

ब्लॉग लेखन की कठिनाईया

बहुत दिन हुए ब्लॉग लिखे समय की किल्लत हैं भाई । ढेर सारी बाते हैं अनुभव हैं सब साझा करूंगा, और कहा रहना हैं आप सब के बीच ही न, ढेरो बाते जो दिल को सुने और गुने भी । समय तेजी से बदल रहा हैं .

Thursday, October 21, 2010

प्रथम चरण का चुनाव संपन्न, जनता का नब्ज टटोल रहे नेता

प्रथम चरण का चुनाव आज बिहार में संपन्न हुआ , नेता एक जगह से दूसरी जगह भागते फिर रहे हैं , सत्ता का खेल चरम पर हैं। नोट बाटे जा रहे हैं । पेड़ न्यूज़ धडल्ले से छापे जा रहे हैं, उसका स्वरुप बदला बदला सा हैं , चुनाव आयोग इसे बंद करने को लेकर चिल्ला रहा हैं । कोई आम जनता की सुनने को तैयार नहीं । गरीबो के पास चुनाव बूथ तक जाने हिम्मत और हैसियत नहीं । चैनल नितीश की जित की घोसना कर रहे हैं। नयी पीढ़ी जानना चाहती हैं क्या ऐसे ही चुनाव होता हैं । कई बाते लोगो की जुबान पर हैं लेकिन वो लोकतंत्र की जुबान पर नहीं चढ़ती । थोथी बातो से क्या बिहार का पिछड़ा पन दूर हो सकता हैं । जरा सोचे.

Thursday, September 30, 2010

अयोध्या विवाद के निपटारे की अदालती पहल

अयोध्या विवाद को लेकर इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ द्वारा आज सुनाये गए ऐतिहासिक फैसले पर पूरी दुनिया की निगाह टिकी थी, सभी राजनितिक डालो की सांसे अटकी थीठीक ३-३० बजे से न्यायालय ने अपना फैसला सुनना शुरू कर दिया। मिडिया की बेचैनी बढती जा रही थी। घरो व दुकानों में जिसे जहा जगह मिली टीवी व रेडियो से चिपका रहा । अदालत ने अपना फैसला सुना दिया। बिहार विधान सभा चुनाव के बीच इस मामले ने बिहार की राजनितिक तपिस को बढ़ा दिया था । मै सीधे वयोवृध इतिहासकार रामशरण शर्मा के घर पंहुचा। ९३ साल के हो चुके शर्मा जी ने अपने संस्मरण सुनाये। कहा की अदालत के बाहर फैसला होना चाहिए था। इतिहास ने कोई भूल नहीं की हैं । मंदिर व मस्जिद के बीच दुरी का कम होना ही विवाद का मूल कारण हैं । क्या हम अदालत के बाहर मामला नहीं सुलझा सकते, हमारी आपसी समझ इतनी कम होती जा रही हैं । अदालत ने पूरी जमीं को तिन हिस्सों में बाट दिया हैं। रामलला को भी भूमि का मालिकाना हक़ दिया हैं। धन्य हैं भारत भूमि .

Saturday, September 18, 2010

चुनाव का बजा बिगुल, नेताओ के घात-प्रतिघात शुरू ,जनता गई तेल में

बिहार विधान सभा चुनाव -२०१० का बिगुल बज गया हैं , भारत निर्वाचन आयोग ने चुनाव की तिथि निर्धारित कर दी हैं , २७ सितम्बर को पहले चरण के लिए नामांकन की प्रक्रिया शुरू होगी, इधर नेताओ के घात - प्रतिघात का दौर शुरू हो चूका हैं । कांग्रेस ने राहुल गाँधी को अपनी मुहीम में लगा दिया हैं , तो दूसरी ओर लालू-पासवान की दोस्ती परवान चढ़ रही हैं। विकास - विकास दर में वृद्धि की राग अलापते नितीश कुमार और सुशिल कुमार मोदी , जनता दल यु - भाजपा गठबंधन अपनी दूसरी पारी खेलने के लिए तैयार हैं। भाजपा - जदयू में जहा नरेन्द्र मोदी के चुनावी सभाओ के आयोजन को लेकर हाय - तौबा मची हैं , तो लालू - पासवान को अपने गर्दिश के दिनों से उबरने के लिए एक सुनहरा मौका सा मिल गया हैं, वे बिहार को विकास की नई डगर पर ले जाने की घोषणा करते फिर रहे हैं। लालू ने तो अपनी पत्नी व् पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवे को जहा साइड लाइन पर रख दिया हैं और रामविलास पासवान के छोटे भाई व् विधायक पशुपति कुमार पारस को उप मुख्यमंत्री के बतौर स्वीकार कर लिया हैं , उससे भविष्य की कल्पना की जा सकती हैं। पांच वर्षो के एनडीए शासन में विरोधी दल की ठीक से भूमिका नहीं निभा सकने वाली राजद लोजपा को अब आम जनता की चिंता सताने लगी हैं। कांग्रेस की स्थिति मजबूत होने से बिहार चुनाव एक रोमांचक दौर में पहुच गया हैं। बिहार में बदलाव के कई दौर अभी आने शेष हैं लेकिन मौजूदा राजनीतिक स्तिथि में ऐसी कलप्ना करना कोरी मुर्खता होगी । आम अवाम के दुखो की चिंता में कोई शामिल नहीं हैं । रोजगार की तलाश में पलायन जरी हैं , पढ़ाई की समुचित व्यवस्था नहीं हैं , इलाज के लिए बड़े शहरो का चक्कर लगाना पड़ता हैं । कल कारखाने , बिजली की उपलब्धता नहीं हैं, प्राकृतिक आपदा राजनीती चमकाने का जरिया मात्र बन गयी हैं .

Thursday, September 2, 2010

नक्सलियों को उकसाना बंद करे, हिंसा नहीं समाधान

गरीबी भुखमरी से जूझती जनता को नक्सलवाद का सहारा मिल रहा हैं, वे कोई उनकी भूख नहीं मिटा रहे न ही कोई स्थाई रोजगार के अवसर पैदा कर रहे लेकिन उनमे यह उम्मीद जगाए रखते हैं। उम्मीद भूख को समाप्त करने की , बेरोजगारी मिटाने की , जल , जमीं और जंगल के ऊपर उनके अधिकार दिलाने की । उनके बच्चो और महिलाओ को स्वास्थ्य की सुविधाए दिलाने की। वे आदिवासियों में कोई बैज्ञानिक पैदा नहीं करना चाहते । विधानसभाओ और लोक सभा में उनके समर्थक पहुचे हुए हैं , लेकिन वे भी अपने को लाचार महसूस कर रहे हैं। कई नेता तो अपने बच्चो को विदेशो में या कॉन्वेंट स्कुलो में पढ़ा रहे हैं लेकिन गरीबो को मरने मरने के लिए तैयार कर रखा हैं । केंद्र या राज्य सरकारों को इन्हें उकसाने वाली कार्यो से बचना चाहिए, भटके हुए लाचार लोगो को शेयर की जरुरत होती हैं, सरकारे हिंसा के लिए प्रेरित करने वालो के खिलाफ कड़ी करवाई करे , साथ ही साथ नक्सल प्रभावित इलाकों में बड़े स्तर पर राहत व पुनर्वास कार्यकर्म संचालित करे । बिहार में ४ दिनों से नक्सलियों ने कोहराम मचा रखा हैं , उन्हें कई बार सरकारों की ओर से सही जबाब नहीं मिल पा रहा हैं। निर्णय करने वाले स्थिति पर नजर रखे हैं लेकिन कुछ नहीं हो रहा हैं । वे चार पुलिस कर्मियों को बंधक बना रखा हैं , दूसरी ओर ७ को अबतक मार चुके हैं । हिंसा के रास्ते समाधान निकलना संभव नहीं हैं।

Thursday, August 19, 2010

छोटे शहरो में कॉमनवेल्थ गेम की चर्चा

दिल्ली से मिडिया में छन छन कर आ रही ख़बरे कॉमनवेल्थ की तैयारी और उससे जुडी सच्चाई को बया कर रही हैं , छोटे शहरो में उत्सुकता बढ़ा रही हैं, देश की प्रतिष्ठा दाव पर लगी हैं, चर्चाओ का बाजार गर्म हैं, कौन मॉल बना रहा हैं, कौन विज्ञापन को लेकर अपने हाथ खीच रहा हैं, शीला जी परेशान हैं, देश की निगाहे दिल्ली दरबार पर टिकी हैं । मिडिया की खबरों को दरकिनार करते हुए तैयारी अपने अंतिम चरण में हैं। भोजपुर जिले का मुख्यालय हैं आरा। यहाँ का एक नवयुवक प्रशांत जो दिल्ली से लौटा हैं, कहता हैं " दिल्ली में खेल के मैदानों , सडको को दुरुश्त किया जा रहा हैं लेकिन स्तर बेहद घटिया हैं। दिल्ली वासियों को फुरशत नहीं कि वे उसकी सामाजिक निगरानी करे। " यह सही हैं कि अपने यहाँ राष्ट्रीय गौरव कि भावना किसी खास तैयारी के दौरान देखने को नहीं मिलती। छोटे शहर इससे तब ज्यादा जुडेगे जब "विज्ञापन युद्ध" शुरू होगा। कॉमन वेल्थ ko darshne wale ti shirt व अन्य दैनिक उपयोग कि सामग्रियों का बाजार सजने लगेगा। ग्रामीण इलाके के बच्चे टीवी में आँखों को चौंधियाती रौशनी में अपने खेल के मैदानों कि तुलना करेंगे । मछली पकड़ने वाले, गाय चराने वाले युवको कि टोली घास के मैदानों पर उधम मचाएगी। क्या हम पडोसी देश चीन से किसी भी खेल आयोजनों की तैयारी की सिख नहीं ले सकते। विश्व के सबसे युवा देश भरते के युवाओ को उससे संबध नहीं कर सकते । क्यों बड़े कार्पोरेट घरानों के ऊपर निर्भर हो कर हम अपनी प्रतिष्ठा को ठोकर मरने पर तुले हैं । कई बार राजनेता नहीं समझते की यह चुनाव की तैयारी नहीं और न ही कोई बच्चो का खेल हैं ........